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Vidhan Sabha
अध्याय २० प्रक्रिया के साधारण नियम
 

(क) सभा की भाषा

 

२८२- सभा की भाषा-

संविधान के उपबन्धों के अधीन सभा का कार्य हिन्दी भाषा और देवनागरी लिपि में होगा।

(ख) सूचना

२८३- सूचनाओं का दिया जाना -

(१) प्रत्येक सूचना जिसकी नियमों के अन्तर्गत आवश्यकता हो प्रमुख सचिव को सम्बोधित करके लिखित रूप में दी जायेगी और वह पटल पर या उसके कार्यालय में कार्यकाल के भीतर छोड़ दी जायेगी।

(२) जब तक नियमों में अन्यथा उपबन्ध न हो, सूचना जो कार्यालय में उपर्युक्त उप नियम में दिये हुए समय के उपरान्त अन्य समयों में प्राप्त हो, वह अगले खुलने वाले दिन प्राप्त हुई समझी जायगी।

(३) जब सदन का उपवेशन हो रहा हो तो कटौती प्रस्तावों के अतिरिक्त जो सूचनायें उप नियम (१) के अन्तर्गत सायंकाल चार बजे तक प्राप्त हों, उनकी प्रतिलिपि प्रमुख सचिव, सदस्यों में अगले दिन १० बजे तक परिचालित करेंगे।

(ग) संशोधन

२८४- ग्राह्य़ संशोधन -

(१) इन नियमों के अधीन प्रत्येक संशोधन उस प्रस्ताव के विषय से सुसंगत होना चाहिए,जिस पर वह प्रस्थापित किया जाय।

(२) ऐसा संशोधन प्रस्थापित नहीं किया जा सकेगा जो स्वीकृत हो जाने पर केवल नकारात्मक मत का बोधक हो।

(३) जब प्रस्ताव के किसी भाग के संशोधन पर विनिश्चय हो चुका हो तो पूर्व का भाग संशोधित नहीं किया जायेगा।

(४) कोई ऐसा संशोधन प्रस्थापित नहीं किया जा सकेगा जो उसी विषय पर दिये गये पूर्व विनिश्चय से असंगत हो।

(५) अध्यक्ष को अभिसूचित संशोधनों के प्रवरण की शक्ति होगी तथा वे किसी प्रक्रम में किसी संशोधन को जो उसकी राय में निरर्थक या अनियमित हो, अनुज्ञापित कर सकेंगे या उस पर मत लेना अस्वीकार कर सकेंगे।

२८५-संशोधन पर मत लेने की रीति -

(१) जब किसी प्रस्ताव पर एक या एक से अधिक संशोधन प्रस्तुत किये जायं तब अध्यक्ष उन पर प्रश्न उपस्थित करने से पूर्व मूल प्रस्ताव को सदन को बतायेंगे या पढ़कर सुनायेंगे।

(२) यह अध्यक्ष के स्वविवेक पर निर्भर होगा कि वे पहले मूल प्रस्ताव को या किसी संशोधन को मत के लिए रखें।

(घ) सदस्यों द्वारा पालनीय नियम

२८६-सभा में उपस्थिति के समय सदस्यों द्वारा पालनीय नियम -

जब सदन का उपवेशन हो रहा हो, तो सदस्य-

(१) ऐसी पुस्तक, समाचार पत्र या पत्र नहीं पढ़ेंगे और न उस कार्य के अतिरिक्त ऐसा कोई कार्य करेंगे, जिसका सदन की कार्यवाही से सम्बन्ध न हो,

(२) किसी सदस्य के भाषण करते समय उसमें अव्यवस्थित बात या शोर या किसी अन्य अव्यवस्थित रीति से बाधा नहीं डालेंगे,

(३) सदन में प्रवेश करते समय या सदन के बाहर जाते समय और अपने स्थान पर बैठते समय या वहां से उठते समय भी अध्यक्ष-पीठ के प्रति नमन करेंगे,

(४) अध्यक्ष-पीठ और ऐसे सदस्य के बीच में से जो भाषण दे रहा हो, नहीं गुजरेंगे,

(५) जब अध्यक्ष सदन को सम्बोधित कर रहे हों, तो न सदन के बाहर जायेंगे और न एक ओर से दूसरी ओर जायेंगे,

(६) सदैव अध्यक्ष-पीठ को ही सम्बोधित करेंगे,

(७) सदन को सम्बोधित करते समय अपने सामान्य स्थान पर ही रहेंगे,

(८) जब सदन में नहीं बोल रहे हों तो शान्त रहेंगे,

(९) कार्यवाही में रुकावट नहीं डालेंगे, चीत्कार नहीं करेंगे या बाधा नहीं डालेंगे और जब सदन में भाषण दिये जा रहे हों तो साथ-साथ उनकी टीका नहीं करेंगे,

(१०) भाषण करते समय दीर्घा में किसी अजनबी की ओर संकेत नहीं करेंगे।

२८७-अध्यक्ष द्वारा पुकारे जाने पर सदस्य का बोलना -

जब कोई सदस्य, बोलने के लिए खडे हों तो अध्यक्ष उनका नाम पुकारेंगे यदि एक ही समय पर एक से अधिक सदस्य खडे हो जायें तो जिस सदस्य का नाम पुकारा जायेगा उन्हीं को बोलने का अधिकार होगा।

२८८-सदन को सम्बोधित करने का ढंग -

कोई सदस्य, जो सदन के समक्ष किसी विषय पर कुछ कहना चाहते हों, बोलते समय खडे़ होंगे और अध्यक्ष को सम्बोधित करेंगे:

                परन्तु अध्यक्ष रोग या दुबर्लता के कारण किसी असमर्थ सदस्य को बैठ कर बोलने की अनुज्ञा दे सकेंगे।

२८९-बोलने तथा प्रश्नों का उत्तर देते समय पालनीय नियम -

१) प्रत्येक भाषण का विषय चर्चाधीन विषय से सर्वथा सुसंगत होना चाहिए।

(२) बोलने तथा प्रश्न का उत्तर देते समय कोई सदस्य-

(क) किसी प्रश्न का वंचनात्मक उत्तर नहीं देंगे,

(ख) किसी ऐसे वास्तविक तथ्य पर, जो न्यायालय के विचाराधीन हो, कोई विचार प्रकट न करेंगे और न कोई आलोचना करेंगे,

(ग) किसी सदस्य पर व्यक्तिगत आरोप तथा लांछन नहीं लगायेंगे,

(घ) संसद या किसी राज्य के विधान मण्डल के व्यवहार या कार्य के विषय में अशिष्ट भाषा का प्रयोग नहीं करेंगे,

(ङ) सदन के विनिश्चय की, ऐसे अवसर को छोड़कर, जब उसके निरसन का प्रस्ताव विचाराधीन हो, आलोचना नहीं करेंगे,

(च) राष्ट्रपति, किसी राज्यपाल अथवा किसी न्यायालय के आचरण पर आक्षेप नहीं करेंगे,

(छ) राज्य-द्रोहात्मक या मानहानिकारक शब्दों का प्रयोग नहीं करेंगे, किन्तु वह अध्यक्ष की अनुज्ञा से अपने तर्क के प्रयोजन के लिए उनको उदधृत कर सकेंगे,

(ज) कोई ऐसी बात नहीं कहेंगे जो अध्यक्षासन अथवा सदन के लिए अनादर सूचक हो।

२८९-क- किसी व्यक्ति के विरुद्ध आरोप लगाने के सम्बन्ध में प्रक्रिया-

किसी सदस्य द्वारा किसी व्यक्ति के विरुद्ध मानहानिकारक या अपराधारोपक स्वरूप का आरोप नहीं लगाया जायेगा, जब तक कि सदस्य ने अध्यक्ष को तथा सम्बन्धित मंत्री को पूर्व सूचना न दे दी हो जिसमें मंत्री उत्तर के प्रयोजन के लिए विषय की जांच कर सकें:

                परन्तु अध्यक्ष किसी भी समय सदस्य को ऐसा आरोप लगाने से प्रतिषिद्ध कर सकेंगे यदि उनकी राय हो कि ऐसा आरोप सदन की गरिमा के विरुद्ध है या ऐसा आरोप लगाने से कोई लोकहित सिद्ध नहीं होता।

२९०-प्रश्न अध्यक्ष के माध्यम से पूछे जायेंगे-

जब चर्चा के बीच स्पष्टीकरण के लिए या किसी अन्य पर्याप्त कारण से, किसी सदस्य को सभा के विचाराधीन किसी विषय पर किसी अन्य सदस्य से कोई प्रश्न पूछना हो तो वह अध्यक्ष के माध्यम से प्रश्न पूछेंगे।

२९१-असंगति या पुनरावृत्ति-

अध्यक्ष ऐसे सदस्य के जो बार-बार असंगत बातें करें या स्वयं अपनी या अन्य सदस्यों द्वारा वाद-विवाद में प्रयुक्त युक्तियों की अरुचिकर पुनरावृत्ति करें, व्यवहार की ओर सभा का ध्यान दिलाने के उपरान्त उस सदस्य का भाषण बन्द करने का निर्देश दे सकेंगे।

२९१-क-वैयक्तिक स्पष्टीकरण -

कोई सदस्य अध्यक्ष की अनुज्ञा से वैयक्तिक स्पष्टीकरण कर सकेंगे यद्यपि सदन के सामने कोई प्रश्न न हो, किन्तु उस अवस्था में कोई विवादास्पद प्रश्न नहीं उठाया जायगा और कोई वाद-विवाद नहीं होगा।

(ङ) भाषणों का क्रम तथा उत्तर देने का अधिकार

२९२-भाषणों का क्रम तथा उत्तर देने का अधिकार-

(१) प्रस्तावक सदस्य के भाषण के उपरान्त अन्य सदस्य प्रस्ताव पर अध्यक्ष द्वारा निश्चित क्रमानुसार भाषण कर सकेंगे। यदि कोई सदस्य अध्यक्ष द्वारा पुकारे जाने पर भाषण न करे तो फिर उन्हें अध्यक्ष की अनुज्ञा के बिना वाद-विवाद के किसी आगे के प्रक्रम में प्रस्ताव पर भाषण देने का अधिकार नहीं होगा।

(२) अन्यथा उपबन्ध होने के अतिरिक्त कोई सदस्य किसी प्रस्ताव पर एक से अधिक बार भाषण नहीं देंगे।

(३) कोई सदस्य जिन्होंने कोई मूल प्रस्ताव या उस पर कोई संशोधन प्रस्तुत किया हो या आय-व्ययक की मांगों के लिए किसी मद को कम करने या हटा देने का प्रस्ताव प्रस्तुत किया हो, उत्तर के रूप में पुनः भाषण कर सकेंगे, और यदि प्रस्ताव या संशोधन किसी असरकारी सदस्य द्वारा प्रस्तुत किया गया हो तो उस मंत्री को, जिसके विभाग से चर्चाधीन विषय का सम्बन्ध हो, प्रस्तावक के पश्चात् भाषण करने का अधिकार होगा, चाहे उन्होंने विवाद में पहले भाषण किया हो या न किया हो।

२९३-अध्यक्ष द्वारा संशोधन-

अध्यक्ष स्वयं ही, या किसी सदस्य द्वारा प्रश्न उठाये जाने पर या प्रार्थना किये जाने पर किसी भी समय सदन में विचाराधीन विषय पर सदस्यों को उनके पर्यालोचन में सहायता करने की दृष्टि से सदन को सम्बोधित कर सकेंगे और इस प्रकार व्यक्त किये गये मत को किसी प्रकार के विनिश्चय के रूप में नहीं समझा जायेगा।

(च) अध्यक्ष के खडे़ होने पर प्रक्रिया

२९४-अध्यक्ष के भाषण का मौनपूर्वक श्रवण -

(१) जब कभी अध्यक्ष बोलें (सम्बोधन करें) तो उनका भाषण मौनपूर्वक सुना जायेगा और कोई सदस्य जो उस समय बोल रहे हों या बोलने के लिए खड़े हुए हों तत्काल बैठ जायेंगे।

(२) जब अध्यक्ष सदन को सम्बोधित कर रहे हों तब कोई सदस्य अपने स्थान से नहीं उठेंगे।

(छ) विनिश्चय

२९५-सदन का विनिश्चय प्राप्त करने की प्रक्रिया -

जिस विषय पर सदन का विनिश्चय अपेक्षित हो वह अध्यक्ष द्वारा रखे गये प्रश्न के द्वारा विनिश्चित किया जायेगा।

२९६-प्रस्थापन तथा प्रश्न का रखा जाना -

जब कोई प्रस्ताव किया गया हो तो अध्यक्ष प्रश्न को विचार के लिए प्रस्थापित करेंगे और उसे सदन के विनिश्चय के लिए रखेंगे। यदि किसी प्रस्ताव में दो या अधिक अलग-अलग प्रस्थापनायें शामिल हों तो वे प्रस्थापनायें अध्यक्ष द्वारा अलग-अलग प्रश्नों के रूप में प्रस्थापित की जा सकेंगी।

२९७-आवाजें संग्रहीत होने के बाद किसी भाषण न होना -

किसी प्रश्न पर अध्यक्ष "हां" वालों और "नहीं" वालों, दोनों की आवाजें संग्रहीत कर लें तो उसके बाद कोई सदस्य उस प्रश्न पर नहीं बोलेंगे।

२९८-विनिश्चय -

(१) मत आवाजों द्वारा या विभाजन द्वारा लिये जा सकेंगे और यदि कोई सदस्य ऐसा चाहेंगे तो विभाजन द्वारा लिये जायेंगे:

                परन्तु अध्यक्ष, यदि समझें कि विभाजन की मांग अनावश्यक रूप से की गयी है तो वे हाथ उठाकर मत ले सकेंगे और विभाजन कर परिहार कर सकेंगे।

(२) विभाजन का परिणाम अध्यक्ष द्वारा तत्काल घोषित किया जायेगा और उस पर कोई आपत्ति न की जा सकेगी।

(ज) किसी सदस्य को बाहर चले जाने की आज्ञा देने की या सदन को स्थगित करने या उपवेशन का निलम्बन करने की अध्यक्ष की शक्ति

२९९-सदन में शान्ति और व्यवस्था -

(१) अध्यक्ष व्यवस्था स्थापित रखेंगे और किसी सदस्य को जिनका व्यवहार उनकी राय में अव्यवस्था पूर्ण हो, अथवा अध्यक्ष के प्रति अवज्ञापूर्ण हो, सदन से तुरन्त बाहर चले जाने का निर्देश दे सकेंगे और जिस सदस्य को इस प्रकार बाहर चले जाने का निर्देश दिया जाय वह तत्काल सभा मण्डप से बाहर चले जायेंगे और उस दिन के उपवेशन के अवशिष्ट समय में अनुपस्थित रहेंगे।

(२) अध्यक्ष, निम्नलिखित दशाओं में किसी सदस्य को इंगित कर सकेंगे।

(क) यदि उप नियम (१) के अन्तर्गत बाहर चले जाने का आदेश दिये जाने पर सदस्य उसका पालन न करें, या

(ख) यदि अध्यक्ष उप नियम (१) में प्रदत्त शक्ति का प्रयोग अपर्याप्त समझें, या

(ग) यदि सदस्य जान-बूझकर सदन की कार्यवाही में बार-बार अव्यवस्थित रीति से बाधा डालें, या

(घ) यदि उनके विरुद्ध इस नियम के अधीन एक ही सत्र में, अनुवर्ती अवसरों पर कार्यवाही करना आवश्यक हो जाये।

(३) (क) जैसे ही किसी सदस्य को इंगित किया जायेगा, सदन-नेता या संसदीय कार्य मंत्री अथवा उनकी अनुपस्थिति में कोई सदस्य तत्काल इस आशय का प्रस्ताव करेंगे कि इंगित सदस्य को सदन की सेवा से निलम्बित किया जाय और ऐसे प्रस्ताव पर प्रश्न बिना किसी संशोधन या विवाद या स्थगन प्रक्रिया के सदन के समक्ष उपस्थि कर दिया जायेगा।

(ख) इस प्रकार किसी सदस्य के निलम्बित किये जाने पर पहली बार निलम्बन की अवधि ३ उपवेशनों के लिए होगी, दूसरी बार ७ उपवेशनों के लिए और अनुवर्ती अवसरों पर, यदि सदन अन्यथा विनिश्चय न करे, सत्र की अवशिष्ट कालावधि के लिए होगी:

                परन्तु निलम्बन की कोई कालावधि किसी अवस्था में भी सत्र की अवशिष्ट कालावधि से अधिक न होगी।

(ग) सदन द्वारा निलम्बित सदस्य बाध्य होंगे कि वे सदन के परिसर का तुरन्त परित्याग करें। किन्तु ऐसा न करने पर और अध्यक्ष द्वारा सदन का ध्यान इस ओर आकृष्ट किये जाने पर कि बल का प्रयोग अनिवार्य हो गया है, निलम्बित सदस्य, बिना किसी अग्रेतर प्रस्ताव के सत्र की अवशिष्ट कालावधि के लिए निलम्बित हो जायेंगे।

(घ) सदन की सेवा से निलम्बित सदस्य, सदन के परिसर में प्रवेश करने से और सदन और समितियों की कार्यवाहियों में भाग लेने से वर्जित रहेंगे:

            परन्तु अध्यक्ष किसी निलम्बित सदस्य को तदर्थ प्रार्थना किये जाने पर सदन के परिसर में किसी विशेष प्रयोजन के लिए आने की अनुमति दे सकेंगे।

(४) सदन किसी समय प्रस्ताव किये जाने पर यह आदेश दे सकेगा कि उपर्युक्त उप नियम (३) के अधीन दिया गया निलम्बन का कोई दण्ड या उसका असमाप्त भाग निरस्त किया जाय।

(५) अध्यक्ष को अपने आदेश या सदन के विनिश्चयों को कार्यान्वित करने की पूरी शक्ति होगी और वे कार्यवाही के किसी भी प्रक्रम पर आवश्यक बल का प्रयोग कर सकेंगे या करने का अधिकार दे सकेंगे।

(६) सदन में घोर अव्यवस्था होने की दशा में अध्यक्ष, किसी उपवेशन को ऐसे समय के लिए जिसे वह निर्धारित करें, निलम्बित कर सकेंगे।

२९९-क-कतिपय परिस्थितियों में सदस्य को निलम्बित  समझा जाना -

यदि कोई सदस्य सदन के किसी उपवेशन में सभा मण्डप के मध्य रिक्त स्थान में आकर सदन के सेवकों की मेज पर रखे पत्रादि को छीनता है या छीनने का प्रयास करता है अथवा उन्हें फाड़ता है या फाड़ने का प्रयास करता है अथवा कोई कागज, पत्रावली आदि अध्यक्ष पीठ की ओर फेंकता है या फेंकने का प्रयास करता है अथवा अध्यक्ष पीठ पर चढ़ता है या चढ़ने का प्रयास करता है तो अध्यक्ष या पीठासीन सदस्य द्वारा ऐसे सदस्य का नाम पुकारे जाने पर, ऐसा सदस्य उक्त उपवेशन के लिए सदन की सेवा से निलम्बित समझा जायेगा।

(झ) औचित्य प्रश्न

३००-औचित्य प्रश्न और उन पर विनिश्चय -

(१) औचित्य प्रश्न इन नियमों के या संविधान के ऐसे अनुच्छेदों के, जिनसे सदन का कार्य विनियमित होता है निर्वचन या प्रवर्तन के सम्बन्ध में होगा और उसमें ऐसा प्रश्न उठाया जायेगा जो अध्यक्ष के संज्ञान में हो।

(२) औचित्य प्रश्न तत्समय सदन के समक्ष कार्य के सम्बन्ध में उठाया जा सकेगा:

                परन्तु अध्यक्ष किसी सदस्य को कार्य की एक मद समाप्त होने और दूसरी के प्रारम्भ होने के बीच की अन्तरावधि में औचित्य प्रश्न उठाने की अनुमति दे सकेंगे, यदि वह सदन में व्यवस्था बनाये रखने या सदन के समक्ष कार्य विन्यास के सम्बन्ध में हो।

(३) उप नियम (१) तथा (२) में निर्दिष्ट शर्तों के अधीन रहते हुए कोई सदस्य औचित्य प्रश्न उठा सकेंगे और अध्यक्ष यह विनिश्चय करेंगे कि उठाया गया प्रश्न औचित्य प्रश्न है या नहीं और यदि हो तो उस पर अपना विनिश्चय देंगे जो अन्तिम होगा।

(४) किसी औचित्य प्रश्न पर वाद-विवाद की अनुज्ञा नहीं होगी, किन्तु अध्यक्ष यदि वे ठीक समझें, अपना विनिश्चय देने से पहले सदस्यों की बातें सुन सकेंगे।

(५) औचित्य प्रश्न विशेषाधिकार का प्रश्न नहीं है।

(६) कोई सदस्य-

(क) जानकारी मांगने के लिए, या

(ख) अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए, या

(ग) जब प्रस्ताव पर कोई प्रश्न सदन के सामने रखा जा रहा हो, या

(घ) काल्पनिक, या

(ङ) विभाजन की घण्टियां नहीं बजीं या सुनाई नहीं पड़ीं ऐसा औचित्य प्रश्न नहीं उठायेंगे।

३०१-ऐसा विषय उठाना जो औचित्य प्रश्न न हो -

जो सदस्य सदन की जानकारी में कोई ऐसा विषय लाना चाहें, जो औचित्य प्रश्न न हो तो वह प्रमुख सचिव को लिखित रूप में सूचना देंगे, जिसमें संक्षेप में उस विषय को बतायेंगे जिसे वे सदन में उठाना चाहते हों तथा साथ में कारण भी बतायेंगे कि वे उसे क्यों उठाना चाहते हैं और उन्हें ऐसा प्रश्न उठाने की अनुज्ञा अध्यक्ष द्वारा सम्मति दिये जाने के बाद ही तथा ऐसे समय और तिथि के लिए दी जायेगी जो अध्यक्ष निश्चित करें।

(ञ) कार्यवाही का अभिलेख तथा प्रतिवेदन

३०२- सभा की कायर्वाहियों का अभिलेख -

(१) प्रमुख सचिव सभा की कार्यवाही का एक वृत्त-पत्र, जिसमें सभा के प्रत्येक दिन के विनिश्चयों का संक्षिप्त अभिलेख लिखा जायेगा, रखेंगे।

(२) सदन के प्रत्येक उपवेशन के उपरान्त अध्यक्ष वृत्त-पत्र पर हस्ताक्षर करेंगे और इस प्रकार हस्ताक्षर हो जाने पर यह वृत्त-पत्र सदन के विनिश्चयों का प्रमाणिक अभिलेख बन जायेगा।

(३) वृत्त-पत्र को छापा जायेगा और उसकी प्रतिलिपियां सदस्यों को चार दिन के भीतर उपलब्ध करा दी जायेंगी।

३०३- सभा की कार्यवाहियों का प्रतिवेदन -

(१) प्रमुख सचिव, सभा के प्रत्येक उपवेशन की कार्यवाही का सम्पूर्ण और शुद्ध प्रतिवेदन भी तैयार करायेंगे तथा उनको ऐसे रूप में और ऐसे ढंग से जैसा कि अध्यक्ष समय-समय पर निर्देश दें, प्रकाशित करायेंगे।

(२) ऐसे प्रतिवेदन की एक प्रतिलिपि तीन मास के भीतर प्रमुख सचिव द्वारा सभा के प्रत्येक सदस्य तथा राज्यपाल को भेजी जायेगी।

३०४- सदन की कार्यवाही से शब्दों का निकाला जाना -

 (१) यदि अध्यक्ष की राय हो कि सदन में कोई ऐसा शब्द या ऐसे शब्द प्रयुक्त किये गये हैं जो मानहानिकारक या अशिष्ट या असंसदीय या अभद्र हैं, तो वे स्वविवेक से आदेश दे सकेंगे कि ऐसा शब्द या ऐसे शब्द सदन की कार्यवाही में से निकाल दिये जायं।

(२) सदन की कार्यवाही में से इस प्रकार निकाले गये अंश छापे नहीं जायेंगे अपितु उसके स्थान पर तारांक लगाया जायगा और कार्यवाही में निम्नलिखित व्याख्यात्मक टिप्पणी समाविष्ट की जायेगी: "अध्यक्ष पीठ से दिये गये आदेशानुसार अमुक-अमुक तिथि को निकाला गया।"

(ट) अजनबियों का प्रवेश

३०५-अध्यक्ष द्वारा अजनबियों के प्रवेश का विनियमन -

सदन के परिसर के उन भागों में, जो केवल, सदस्यों के उपयोग के लिए सुरिक्षत नहीं हैं, अजनबियों का प्रवेश अध्यक्ष के आदेश या उनके द्वारा निर्मित नियमों द्वारा विनियमित किया जायेगा।

३०६-अजनबियों को हटाने की शक्ति -

अध्यक्ष किसी समय अजनबियों को सदन के किसी परिसर से हटाने का आदेश दे सकेंगे।

३०७-अजनबियों के निष्कासन के लिए कार्य -

सदन के परिसरों के किसी भाग से किसी अजनबी के निष्कासन के लिए अध्यक्ष ऐसा आवश्यक कार्य या ऐसी कार्यवाही, जो प्रकरण की परिस्थति को देखते हुए उनके स्वविवेक में आवश्यक हो, कर सकेंगे।

(ठ) एकल संक्रमणीय मत द्वारा निर्वाचन एवं शलाका के लिए विनियम बनाने की अध्यक्ष की शक्ति

३०८-अध्यक्ष का एकल संक्रमणीय मत द्वारा निर्वाचन एवं शलाका के लिए विनियम बनाना -

अध्यक्ष एकल संक्रमणीय मत द्वारा निर्वाचन की पद्धति के विषय में या किसी अन्य प्रयोजनार्थ शलाका करने के लिए जिसका इन नियमों में कोई उपबन्ध नहीं है, विनियम बनायेंगे।

(ड) सभा द्वारा निर्वाचन

३०९-सभा द्वारा निर्वाचन -

जब किसी अधिनियम के अनुसार अथवा अन्यथा सभा के सदस्यगण अथवा उनके एक भाग को किसी सार्वजनिक संस्था के लिए अपने प्रतिनिधियों का निर्वाचन करना हो तो प्रमुख सचिव इस संबंध में प्रार्थना किये जाने पर अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार या अध्यक्ष के निदेशानुसार तथा उनके द्वारा निर्मित विनियमों के अनुसार, यदि कोई हों, निर्वाचन करने का प्रबन्ध करेंगे।

(ढ) सदन के पटल पर किसी पत्र या लेख्य का रखा जाना

३१०-सदन के पटल पर किसी पत्र या लेख्य का रखा जाना -

सदन के पटल पर कोई पत्र या लेख्य अध्यक्ष के आदेश या प्राधिकार के बिना नहीं रखा जायगा।

(ण) प्रकीर्ण

३११-नियमों का निलम्बन-

कोई सदस्य अध्यक्ष की सम्मति से प्रस्ताव कर सकेंगे कि किसी नियम का सदन के समक्ष किसी विशेष प्रस्ताव पर लागू होना निलम्बित कर दिया जाय और यदि प्रस्ताव स्वीकृत हो जाय तो वह नियम उस समय के लिए निलम्बित कर दिया जायेगा। ऐसी अवस्था में जिस प्रक्रिया का अनुसरण किया जायगा, वह अध्यक्ष द्वारा विनिश्चित की जायेगी।

३१२-निर्वचन एवं कठिनाइयों का निराकरण -

यदि इन नियमों के उपबन्धों में से किसी उपबन्ध के निर्वचन के संबंध में कोई संदेह उत्पन्न हो तो अध्यक्ष का विनिश्चय अन्तिम होगा।

३१३-अवशिष्ट शक्तियां -

ऐसे समस्त प्रश्नों का जिनकी इन नियमों में विशेष रूप से व्यवस्था नहीं की गयी है और इन नियमों के सविस्तार कार्यान्वित करने से सम्बद्व समस्त प्रश्नों का ऐसे ढंग से विनियमन किया जायगा, जैसा कि अध्यक्ष समय-समय पर निर्देश  करें।

३१४-अध्यक्ष के विनिश्चय पर आपत्ति नहीं की जायेगी -

किसी संकल्प या प्रश्न की अनुज्ञा के बारे में या किसी अन्य विषय में अध्यक्ष का जो विनिश्चय हो, उस पर कोई आपत्ति नहीं की जायेगी।

३१४-क- किसी सदस्य के मत पर आपत्ति -

यदि सभा के किसी विभाजन में किसी सदस्य के मत का विनिश्चय किये जाने वाले विषय में उस सदस्य के वैयक्तिक आर्थिक या प्रत्यक्ष हित होने के आधार पर आपत्ति की जाय तो अध्यक्ष, यदि वे आवश्यक समझें, आपत्ति करने वाले सदस्य से अपनी आपत्ति के आधारों को सुतथ्यतः कहने के लिए और जिस सदस्य के मत पर आपत्ति की गयी हो उससे अपना मामला बताने के लिए कह सकेंगे और यह विनिश्चय करेंगे कि उस सदस्य का मत अस्वीकृत किया जाना चाहिये या नहीं और उनका विनिश्चय अन्तिम होगा:

                                परन्तु किसी सदस्य या सदस्यों के मत पर आपत्ति मत विभाजन समाप्त होने के तुरन्त बाद और अध्यक्ष द्वारा परिणाम घोषित किये जाने के पहले की जाये।

                                व्याख्या- इस नियम के प्रयोजनों के लिए सदस्य का हित प्रत्यक्ष वैयक्तिक या आर्थिक होना चाहिए और वह हित जन साधारण या उसके किसी वर्ग या भाग के साथ सम्मिलित रूप या राज्य की नीति के किसी विषय में न होकर उस व्यक्ति का जिसके मत पर आपत्ति की जाय पृथक रूप से होना चाहिए।

(त) सापेक्ष अग्रेता

३१५- सदन के समक्ष विभिन्न वर्गों के कार्य की सापेक्ष अग्रेता-

इन नियमों में किसी बात के होते हुए भी तथा अध्यक्ष के अन्यथा निर्देश के अधीन रहते हुए सदन के समक्ष विभिन्न वर्गों के कार्यों की, जो नीचे निर्दिष्ट किये गये हैं सापेक्ष अग्रेता निम्नलिखित क्रमानुसार होगी:

(१)                  शपथ अथवा प्रतिज्ञान,

(२)                  प्रश्न (अल्पसूचित प्रश्न भी सम्मिलित हैं),

(३)                  निधन के निर्देश,

(४)                  पटल पर रखे जाने वाले पत्र,

(५)                  राज्यपाल के सन्देशों की संसूचना,

(६)                  परिषद् से सन्देशों की संसूचना,

(७)                  विधेयकों पर राष्ट्रपति/ राज्यपाल की अनुमति कि संबंध में सूचना,

(८)                  दंडाधिकारी अथवा अन्य प्राधिकारियों से सदन के सदस्यों की गिरफ्तारी या निरोध या रिहाई के संबंध में सूचनायें,

(९)                  समितियों के प्रतिवेदनों का उपस्थापन,

(१०)               विधेयकों के संबंध में प्रवर समिति, संयुक्त प्रवर समिति के सामने आये साक्ष्य का रखा जाना,

(११)               याचिकाओं का उपस्थापन,

(१२)               प्रश्न जिनमें विशेषाधिकार की अवहेलना अन्तर्ग्रस्त हो,

(१३)               सदन के उपवेशनों से सदस्यों की अनुपस्थिति की अनुज्ञा के सम्बन्ध में अध्यक्ष द्वारा घोषणा,

(१४)               विभिन्न विषयों के सम्बन्ध में अध्यक्ष द्वारा घोषणा, उदाहरणार्थ सदन के सदस्यों के त्याग-पत्र, अधिष्ठाता मण्डल, समिति आदि के लिए नाम-निर्देशन,

(१५)               अध्यक्ष की व्यवस्थायें अथवा घोषणायें,

(१६)               मंत्रियों द्वारा विविध वक्तव्य,

(१७)               भूतपूर्व मंत्री द्वारा अपने त्याग-पत्र की व्याख्या के सम्बन्ध में व्यक्तिगत वक्तव्य,

(१८)               समिति के निर्वाचन के लिए प्रस्ताव,

(१९)               किसी विधेयक पर प्रवर समिति या संयुक्त प्रवर समिति का प्रतिवेदन उपस्थित करने के समय को बढ़ाने का प्रस्ताव,

(२०)               विधेयक जो वापस लिया जाय,

(२१)               विधेयक जो पुरःस्थापित किया जाय,

(२२)               अध्यादेशों द्वारा तुरन्त विधान निर्माण के कारणों के व्याख्यात्मक वक्तव्य का रखा जाना,

(२३)               कार्य-मंत्रणा समिति के प्रतिवेदन को स्वीकार करने का प्रस्ताव,

(२४)               अध्यक्ष, उपाध्यक्ष को हटाने के संकल्प को प्रस्तुत करने की अनुज्ञा का प्रस्ताव,

(२५)               मंत्रि-परिषद् में अविश्वास का प्रस्ताव करने की अनुज्ञा का प्रस्ताव,

(२६)               विशेषाधिकार समिति के प्रतिवेदन पर विचार,

(२७)               सदन के कार्य स्थगित करने के प्रस्तावों को प्रस्तुत करने की अनुज्ञा,

(२८)               उस दिन के अन्य सामान्य कार्य ,

(२९)               ध्यान आकृष्ट करने की सूचनायें।

 

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