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Vidhan Sabha
अध्याय १५ वित्तीय विषयों के सम्बन्ध में प्रक्रिया

(ख) विनियोग विधेयक

१८७- साधारण चर्चा-

(१) आय-व्ययक प्रस्तुत किये जाने के कम से कम दो दिन बाद अध्यक्ष द्वारा नियत दिनों पर आय-व्ययक पर या उसमें अन्तर्ग्रस्त सिद्वान्तों के किसी प्रश्न पर साधारण चर्चा सामान्यतया ५ दिन होगी, किन्तु इस प्रक्रम पर कोई प्रस्ताव प्रस्तुत नहीं किया जायेगा और न ही आय-व्ययक सदन में मतदान के लिये रखा जायेगा।

(२) वित्त मंत्री को चर्चा के अन्त में उत्तर देने का सामान्य अधिकार होगा ।

(३) यदि अध्यक्ष उपयुक्त समझें तो वे भाषणों की समय-सीमा विहित कर सकेंगे।

१८८- मांगों पर मतदान-

(१) अध्यक्ष, सदन-नेता के परामर्श से अनुदान की मांगों पर विचार और मतदान के लिये २४ दिनों से अनधिक के दिन नियत करेंगे।

(२) उप नियम (१) के अधीन रहते हुए अनुदान की मांग ऐसे क्रम में उपस्थित की जायेगी जैसा कि सदन-नेता विरोधी दल के नेता से परामर्श  करके निश्चित करें।

(३) उप नियम (१) के अन्तर्गत नियत दिनों में प्रश्नों के अतिरिक्त अध्यक्ष की सम्मति के बिना कोई कार्य नहीं किया जायेगा।

(४) इस प्रक्रम में किसी अनुदान की मांग को कम करने या उसकी किसी मद को निकाल देने के प्रस्ताव किये जा सकेंगे, किन्तु अनुदान की मांग में वृद्वि या उसके लक्ष्य में परिवर्तन करने के प्रस्ताव नहीं किये जा सकेंगे ।

(५) किसी अनुदान की मांग को कम करने के प्रस्ताव पर संशोधन करने की अनुज्ञा न होगी ।

(६) जब एक ही मांग से सम्बद्व अनेक प्रस्ताव प्रस्तुत किये जायं तो जिस क्रम में उनसे सम्बद्व शीषर्क आय-व्ययक में दिये हों उसी क्रम में उन पर चर्चा की जायगी ।

(७) उप नियम (१) के अन्तर्गत नियत दिनों के अन्तिम दिन उपवेशन की साधारण समाप्ति के लगभग आधा घंटा पूर्व अध्यक्ष, अनुदानों के लिये मांगों के सम्बन्ध में अवशिष्ट विषयों के निस्तारण के निमित्त प्रत्येक आवश्यक प्रश्न तुरन्त रखेंगे, और इस प्रक्रिया में कार्यवाही को स्थगित करने का कोई प्रस्ताव प्रस्तुत नहीं किया जायेगा, न किसी प्रकार की बाधा डाली जायेगी और न उसके सम्बन्ध में कोई विलम्बकारी प्रस्ताव ही किया जायगा ।

१८९- कटौती प्रस्ताव-

किसी मांग की राशि कम करने के लिये निम्नलिखित में से किसी भी ढंग से प्रस्ताव प्रस्तुत किया जा सकेगा-

(क) "कि मांग की राशि घटाकर एक रूपया कर दी जाय"-मांग में अन्तर्निहित नीति से अननुमोदन प्रकट करने के लिये ऐसा प्रस्ताव "नीति अननुमोदन कटौती" कहा जायगा, ऐसे प्रस्ताव की सूचना देने वाले सदस्य उस नीति का ब्यौरा सुतथ्यतया दर्शाय़ेंगे जिस पर वे चर्चा करना चाहते हों। चर्चा सूचना में उल्लिखित विशिष्ट बात या बातों तक सीमित रहेगी और सदस्य वैकल्पिक नीति का सुझाव दे सकेंगे;

(ख) "कि मांग की राशि में उल्लिखित राशि की कमी की जाय"-जो की जा सकने वाली "मितव्ययता" को प्रदर्शित करे। ऐसी उल्लिखित राशि या तो मांग में से एकमुश्त घटाई जाने वाली राशि हो सकेगी या मांग की किसी मद का विलोपन अथवा उसमें घटाई जाने वाली राशि हो सकेगी। ऐसा प्रस्ताव "मितव्ययता कटौती" कहा जायेगा। सूचना में संक्षेप में और सुतथ्यतया वह विशेष विषय दर्शाय़ा जायेगा, जिस पर चर्चा के उठानी हो और भाषण, और इस बात की चर्चा के लिये ही सीमित होंगे कि मितव्ययता कैसे की जा सकती है;

 (ग) "कि मांग की राशि में १०० रू० की कमी की जाय"-ऐसी विशिष्ट शिकायत को प्रकट करने के लिये जो शासन के उत्तरदायित्व के क्षेत्र में हो। ऐसा प्रस्ताव "प्रतीक कटौती" कहा जायगा और उस पर चर्चा प्रस्ताव में उल्लिखित विशिष्ट शिकायत तक ही सीमित होगी।

१९०- कटौती प्रस्तावों की ग्राह्यता की शतें-

(१) मांग की राशि कम करने की सूचना ग्राह्य हो सके, इसके लिये वह निम्नलिखित शर्ते पूरी करेगी, अर्थात्:-

(क) उसका सम्बन्ध केवल एक मांग से होगा;

(ख) वह स्पष्टतया व्यक्त की जायेगी और उसमें प्रतर्क, अनुमान, व्यंग्यात्मक पद, अभ्यारोप, विशेषण या मानहानिकारक कथन नहीं होंगे।

(ग) वह एक ही विशिष्ट विषय तक सीमित रखी जायगी़, जिसका वर्णन सुतथ्य शब्दों में किया जायगा;

(घ) उसमें किसी ऐसी व्यक्ति के चरित्र या आचरण पर अभ्युक्ति नहीं की जायेगी, जिसके आचरण पर मूल प्रस्ताव के द्वारा ही आपत्ति की जा सकती हों;

(ङ) उसमें वर्तमान विधियों का संशोधन या निरसन करने के लिये सुझाव नहीं दिये जायेंगे;

(च) वह उस विषय का निर्देश नहीं करेगी जो मुख्यतया शासन का विषय न हो;

(छ) उसका किसी ऐसे व्यय से सम्बन्ध नहीं होगा जो कि उत्तर प्रदेश राज्य की संचित निधि पर भारित हो;

(ज) उसका भारत के किसी भाग में क्षेत्राधिकार रखने वाले किसी न्यायालय के न्याय-निर्णयन के अन्तर्गत किसी विषय से सम्बन्ध नहीं होगा;

(झ) उसमें विशेषाधिकार का प्रश्न नहीं उठाया जायगा;

(ञ) उसमें ऐसा विषय नहीं उठाया जायेगा जिस पर उसी सत्र में चर्चा की जा चुकी हो और जिस पर विनिश्चय किया जा चुका हो;

(ट) उसमें उस विषय की पूर्वाशा नहीं की जायेगी, जो उसी सत्र में विचार के लिये पहले ही नियत किया जा चुका हो;

() उसमें ऐसा विषय नहीं उठाया जायगा जो कोई न्यायिक या अर्धन्य़ायिक कृत्य करने वाले किसी न्यायाधिकरण या संविहित प्राधिकारी के, किसी विषय की जाँच या अनुसंधान करने के लिये नियुक्त किसी आयोग या जाँच न्यायालय के सामने विचाराधीन हो:

                                            परन्तु अध्यक्ष स्वविवेक से ऐसे विषय को सदन मे उठाने की अनुमति दे सकेंगे, जो जाँच की प्रक्रिया अथवा व्याप्ति या प्रक्रम से सम्बन्धित हो, यदि अध्यक्ष का समाधान हो जाये कि इससे न्यायाधिकरण, संविहित प्राधिकारी, आयोग या जाँच न्यायालय द्वारा उस विषय के विचार किये जाने पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की सम्भावना नहीं है; और

(ड) उसका सम्बन्ध तुच्छ विषय से नहीं होगा।

() अध्यक्ष ऐसे कटौती के प्रस्ताव को अस्वीकृत कर सकेंगे जिसके द्वारा उनकी राय में प्रस्ताव प्रस्तुत करने के अधिकार का दुरूपयोग या जिसके द्वारा इन नियमों का उल्लंघन होता हो।

१९१- कटौती के प्रस्ताव की सूचना-

कटौती के प्रस्ताव की सूचना,उस अनुदान पर विचार करने के नियत दिन से कम से कम २ दिन पूर्व दी जायेगी जब तक कि अध्यक्ष अन्यथा निर्देश न दें।

१९२- प्रत्यानुदान तथा अपवादानुदान-

() पूवर्गामी नियमों में किसी बात के होते हुए भी अनुच्छेद २०६ के अन्तर्गत अप्रत्याशित एवं अपवाद अनुदानों के लिये प्राक्कलित व्यय के सम्बन्ध में अग्रिम अनुदानों के प्रस्ताव उपस्थित किये जा सकेंगे।

() ऐसी मांगों पर सभा में उसी प्रकार कार्यवाही होगी जिस प्रकार आय-व्ययक के सम्बन्ध में, अनुदानों की मांगों पर होती है और इस विषय से सम्बद्व नियम ऐसे रूप भेदों सहित जो अध्यक्ष आवश्यक समझें, ऐसी मांगों पर लागू होंगे।

१९३- लेखानुदान-

() लेखानुदान के प्रस्तावों में सम्पूर्ण, अपेक्षित राशि व्यक्त की जायेगी और विभिन्न धनराशियां जो प्रत्येक विभाग अथवा सेवा अथवा व्यय की मद के लिये आवश्यक हों, जिससे वह राशि बनती हो, प्रस्ताव से संलग्न अनुसूची में व्यक्त की जायेगी।

() सम्पूर्ण अनुदान को कम करने के लिये अथवा जिन मदों से मिलकर अनुदान बना हो उनके कम करने या विलुप्त करने के लिये संशोधन प्रस्तुत किये जा सकेंगे।

(३) प्रस्ताव पर या उसमें प्रस्तुत किये गये संशोधनों पर साधारण चर्चा की अनुज्ञा होगी, तथा अनुदानों के विवरणों पर सविस्तार विवाद न होकर केवल इतना उल्लेख किया जा सकेगा जो साधारण चर्चा के हेतु आवश्यक हो ।

(४) अन्य प्रकरणों में लेखानुदान के प्रस्ताव पर उसी प्रकार कार्यवाही की जायेगी जैसे कि वह अनुदान की मांग हो।

१९४- अनुपूरक अथवा अपर अनुदान अथवा अतिरिक्त व्यय के लिये अनुदान-

() राज्यपाल, अनुच्छेद २०५ के अन्तर्गत अनुपूरक अथवा अपर अथवा अतिरिक्त व्यय के सम्बन्ध में अनुदानों के लिये मांगों का विवरण प्रस्तुत करने के लिये दिन नियत कर सकेंगे।

() अध्यक्ष, सदन नेता से परामर्श करके ऐसी मांगों पर चर्चा एवं मतदान के लिये एक या अधिक दिन नियत करेंगे। इन प्रकरणों में उसी प्रक्रिया का जो नियम १८५, १८६, १८७, १८८, १८९, १९० तथा १९१ में निर्धारित की गयी है ऐसे रूप भेदों सहित जो अध्यक्ष आवश्यक समझें, अनुसरण किया जायेगा।

१९५- अनुपूरक अनुदानों पर चर्चा की व्याप्ति-

अनुपूरक अनुदानों पर वाद-विवाद केवल उसकी मदों तक ही सीमित रहेगा जब तक चर्चाधीन मदों की व्याख्या करने या उन्हें स्पष्ट करने के लिये आवश्यक न हो, मूल अनुदानों पर या उनमें अन्तर्निहित नीति पर कोई चर्चा नहीं होगी ।

१९६- प्रतीकानुदान-

जब किसी नयी सेवा पर प्रस्थापित व्यय के लिये पुनर्विनियोग द्वारा धन उपलब्ध किया जा सकता हो, तो कोई प्रतीक राशि के अनुदान की मांग सदन के मतदान के लिये रखी जा सकेगी और यदि सदन मांग की अनुमति दे दे तो धन इस तरह उपलब्ध किया जा सकेगा।

(ख) विनियोग विधेयक

१९७- विनियोग विधेयक-

() संविधान के उपबन्धों के अधीन रहते हुए विनियोग विधेयक के बारे में प्रक्रिया, ऐसे रूप भेदों के साथ जैसे अध्यक्ष आवश्यक समझें, वही होगी जो सामान्यतया, विधेयकों के लिये होती है:

                                               परन्तु किसी विनियोग विधेयक पर कोई ऐसा संशोधन प्रस्थापित नहीं किया जायगा जिसके परिणामस्वरूप अनुच्छेद २०३ के अन्तर्गत दिये गये अनुदान की धनराशि में या उसके लक्ष्य में परिवर्तन हो जाय।

() अध्यक्ष ऐसे विधेयकों को समय के भीतर पारित करने के लिये किसी नियम की प्रक्रिया का निलम्बन कर सकेंगे।

१९८- वित्तीय कार्य के निस्तारण के लिये समय सीमा-

इन नियमों के अन्तर्गत अध्यक्ष, अपनी प्रयोज्य शक्तियों के अतिरिक्त उन समस्त अधिकारों या शक्तियों का प्रयोग कर सकेंगे जो समस्त वित्तीय कार्य को समय के भीतर पूरा करने के लिये आवश्यक हों और विशेष रूप से ऐसे विभिन्न प्रकार के कार्यों की पूर्ति के लिये समय नियत कर सकेंगे और जब समय इस प्रकार नियत कर दिया जाय तो वे नियत समय पर ऐसे प्रक्रम या प्रक्रमों के सम्बन्ध में जिनके लिये समय नियत किया गया हो समस्त अवशिष्ट विषयों के निस्तारण के लिये प्रत्येक आवश्यक प्रश्न प्रस्तुत करेंगे।

व्याख्या-वित्तीय कार्य में ऐसे कार्य का भी समावेश है जिसे अध्यक्ष समझते हैं कि वह संविधान के अन्तर्गत इस श्रेणी में आता है।

१९९- विनियोग तथा वित्त लेखों और लेखा परीक्षा प्रतिवेदनों का प्रकाशन-

विनियोग और वित्त लेखों तथा उन पर लेखा-परीक्षा प्रतिवेदनों के विधान मण्डल के पटलों पर रखे जाने के उपरान्त यथासम्भव शीध्र प्रमुख सचिव सर्वसाधारण की सूचनार्थ उनको प्रकाशित हुआ घोषित करने की अधिसूचना जारी करेंगे।

 

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