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Vidhan Sabha
अध्याय १४ विधान निर्माण
 

(क) विधेयकों का पुरःस्थापन तथा प्रकाशन

११४- विधेयकों को पुरः स्थापित करने से पूर्व प्रकाशित करने की अध्यक्ष की शक्ति-

अध्यक्ष से इस विषय की प्रार्थना की जाने पर वे किसी सरकारी विधेयक (उद्देश्यों और कारणों के विवरण एवं विधायिनी शक्ति के प्रत्यायोजन तथा वित्तीय आभारों से संबंधित ज्ञापनों सहित यदि कोई हों और यदि आवश्यक हो तो राष्ट्रपति की पूर्व मंजूरी या राज्यपाल की सिफारिश सहित) गजट में प्रकाशन का आदेश दे सकेंगे यद्यपि विधेयक को पुरःस्थापित करने की अनुज्ञा के लिये कोई प्रस्ताव नहीं रखा गया हो। उस दशा में विधेयक को पुरः स्थापित करने की अनुज्ञा के लिए प्रस्ताव करना आवश्यक नहीं होगा और यदि विधेयक बाद में पुरःस्थापित किया जाय तो उसको पुनः प्रकाशित करने की आवश्यकता नहीं होगी:

                                    परन्तु साधारणतया विधेयक को इस प्रकार गजट में प्रकाशित करना आवश्यक नहीं होगा यदि सदन सत्र में हो ।

११५- असरकारी सदस्य द्वारा विधेयक के पुर:स्थापन की अनुज्ञा मांगने के लिए प्रस्ताव की सूचना-

(१) असरकारी सदस्य जो किसी विधेयक को पुरःस्थापित करने की अनुज्ञा के लिए प्रस्ताव करना चाहते हों अपने इस अभिप्राय की सूचना देंगे और सूचना के साथ विधेयक की एक प्रति तथा उद्देश्यों और कारणों का एक विवरण जिसमें प्रतर्क नहीं होंगे, भेजेंगे:

                परन्तु अध्यक्ष यदि ठीक समझें, उददेश्यों और कारणों के विवरण को पुनरीक्षित कर सकेंगे।

(२) यदि किसी ऐसे विधेयक को पुर:स्थापित करने की सूचना दी जाय जो अध्यक्ष की राय में राष्ट्रपति की पूर्व मंजूरी अथवा राज्यपाल की सिफारिश के बिना पुर:स्थापित नहीं किया जा सकता, तो अध्यक्ष सूचना की प्राप्ति के उपरान्त यथाशीध्र उस विधेयक को, यथास्थिति, राष्ट्रपति या राज्यपाल को निर्दिष्ट करेंगे।

(३) इस नियम के अन्तर्गत विधेयक को पुर:स्थापित करने की अनुज्ञा के लिये प्रस्ताव की सूचना की कालावधि पन्द्रह दिन होगी, यदि अध्यक्ष इससे कम समय की सूचना पर प्रस्ताव किये जाने की अनुज्ञा न दे दें।

११६- सदन में लम्बित किसी अन्य विधेयक पर निर्भर विधेयक का पुरःस्थापन-

कोई विधेयक जो सदन में किसी अन्य लम्बित विधेयक पर पूर्णतः या अंशतः निर्भर है उस विधेयक के पारित हो जाने की प्रत्याशा में, जिस पर कि वह निर्भर है, सदन में पुर:स्थापित किया जा सकेगा:

                                    परन्तु ऐसा विधेयक सदन में विचार किये जाने तथा पारित किये जाने के लिए तभी लिया जायेगा जबकि लम्बित विधेयक दोनो सदनों द्वारा पारित किया जा चुका हो, और यथास्थिति, राष्ट्रपति अथवा राज्यपाल द्वारा उस पर अनुमति दी जा चुकी हो।

११७- तत्सम विधेयक की सूचना-

जब कोई विधेयक सदन में लम्बित हो तो किसी तत्सम विधेयक की सूचना को चाहे वह लम्बित विधेयक के पुरःस्थापन से पहले प्राप्त हुई हो या बाद में, जब तक कि अध्यक्ष अन्यथा निर्देश न दें, यथास्थिति लम्बित सूचनाओं की सूची से निकाल दिया जायेगा या उसमें प्रविष्ट नहीं किया जायगा।

११८- विधेयकों का वित्तीय ज्ञापन और विधेयकों में धन खण्ड-

 (१) जिस विधेयक में व्यय अन्तर्ग्रस्त हो, उसके साथ एक वित्तीय ज्ञापन होगा जिसमें व्यय अन्तर्ग्रस्त होने वाले खण्डों की ओर विशेषतया ध्यान दिलाया जायगा और उसमें उस आवर्तक तथा अनावर्तक व्यय का भी प्राक्कलन दिया जायेगा जो विधेयक के विधि रूप में पारित होने की अवस्था में अन्तर्ग्रस्त हो।

(२) विधेयकों के जिन खण्डों या उपबन्धों में लोकनिधियों में से व्यय अन्तर्ग्रस्त हो वे अपेक्षाकृत मोटे अक्षरों या वक्राक्षरों में छापे जायेंगे:

                परन्तु जहां किसी विधेयक में कोई खण्ड जिसमें व्यय अन्तर्ग्रस्त हो, मोटे टाइप या वक्राक्षरों में न छापा जाय तो अध्यक्ष, विधेयक के भार-साधक सदस्य को ऐसे खण्डों को सभा की जानकारी में लाने की अनुज्ञा दे सकेंगे।

११९- विधायिनी शक्ति प्रत्यायोजित करने वाले विधेयकों का व्याख्यात्मक ज्ञापन-

जिस विधेयक में विधायिनी शक्ति के प्रत्यायोजन के साथ प्रस्थापनायें अन्तर्ग्रस्त हों उसके साथ एक ज्ञापन होगा जिसमें ऐसी प्रस्थापनाओं की व्याप्ति की व्याख्या होगी।

१२०- अध्यादेशों के सम्बन्ध में विवरण-

(१) जब कभी कोई अध्यादेश प्रख्यापित किया जाय तो उसके प्रख्यापन के बाद, यथास्थिति, अनुगामी सत्र अथवा उपवेशन के प्रारम्भ में अध्यादेश की प्रतिलिपि सहित ऐसा विवरण पटल पर रखा जायेगा जिसमें उन परिस्थितियों को स्पष्ट किया गया हो जिनके कारण अध्यादेश द्वारा तुरन्त विधान बनाना आवश्यक हो गया था ।

(२) तदुपरान्त कोई भी सदस्य तीन दिन की सूचना देकर अध्यादेश का अननुमोदन करने का संकल्प प्रस्तुत कर सकेगा और यदि ऐसा संकल्प स्वीकृत हो जाय तो वह परिषद् के पास उसकी सहमति के लिए भेज दिया जायगा।

(३) जब कभी कोई विधेयक जो किसी अध्यादेश को रूपभेद सहित प्रतिस्थापित करता हों, सदन में पुरःस्थापित किया जाय तो सदन के समक्ष विधेयक के साथ एक विवरण भी रखा जायगा जिसमें उन परिस्थितियों को स्पष्ट किया गया हो जिनके कारण ऐसा रूपभेद करना आवश्यक हो गया था।

१२१- असरकारी सदस्यों के विधेयकों में अग्रेता-

(१) विधेयकों की सूचनाओं की, जो असरकारी सदस्यों ने प्रस्तुत की हो, सापेक्ष अग्रेता का निर्णय शलाका द्वारा होगा, जो अध्यक्ष द्वारा दिये गये उन निदेशों के अनुसार उस दिवस को होगा जो अध्यक्ष नियत करें और जो ऐसे दिवस से कम से कम पन्द्रह दिन पूर्व होगा जिसके लिये शलाका की जाय ।

(२) असरकारी सदस्यों के विधेयकों की सापेक्ष अग्रेता, जो सदन में लम्बित हों, निम्न क्रम में निर्धारित की जायेगी:-

(क) वे विधेयक जो राज्यपाल द्वारा अनुच्छेद २०० और २०१ के अन्तर्गत और संदेश सहित वापस किये गये हों;

(ख) वे विधेयक जिनके सम्बन्ध में उनके पारित किये जाने का प्रस्ताव प्रस्तुत किया जा चुका हो;

(ग) वे विधेयक जो सभा द्वारा पारित तथा परिषद् द्वारा संशोधन सहित लौटाये गये हों ;

(घ) वे विधेयक जो परिषद् द्वारा पारित तथा सभा को पंहुचाये गये हों;

(ङ) वे विधेयक जिनके सम्बन्ध में वह प्रस्ताव स्वीकृत हो चुका है कि विधेयक पर विचार किया जाय;

(च) वे विधेयक जिनके सम्बन्ध में प्रवर समिति का प्रतिवेदन उपस्थित किया जा चुका हों;

(छ) वे विधेयक जो राय जानने के लिये परिचालित किये गये हों;

(ज) वे विधेयक जिनका पुर:स्थापन हो चुका हो और जिनके सम्बन्ध में कोई और प्रस्ताव उपस्थित या स्वीकृत न किया गया हो;

(झ) अन्य विधेयक।

(३) उप नियम (२) के किसी एक खण्ड के अन्तर्गत आने वाले विधेयकों की सापेक्ष अग्रेता शलाका द्वारा ऐसे समय पर और ऐसे ढंग से, जैसा कि अध्यक्ष निर्देश दें, निर्धारित की जायेगी ।

(४) अध्यक्ष विशेष आदेश द्वारा जो सभा में विघोषित किया जायेगा उप नियम (२) में दिये गये विधेयकों की सापेक्ष अग्रेता में ऐसे परिवर्तन कर सकेंगे जो वे आवश्यक या सुविधाजनक समझें।

अनु0 200 और 201

१२२- मंत्री को असरकारी सदस्य के विधेयक की प्रतिलिपि भेजना-

जब कभी सभा का कोई असरकारी सदस्य किसी विधेयक को पुरःस्थापित करने की अनुज्ञा मांगने के लिये प्रस्ताव प्रस्तुत करने के अभिप्राय की सूचना दे और यदि उसे शलाका में स्थान प्राप्त हो जाय तो प्रमुख सचिव यथाशीध्र उसकी एक प्रतिलिपि उद्देश्यों और कारणों के विवरण सहित सम्बन्धित मंत्री को भेज देंगे ।

१२३- पुरःस्थापन की अनुज्ञा के लिए प्रस्ताव-

(१) नियम ११४ के अधीन रहते हुए किसी भी विधेयक की पुरःस्थापना के पूर्व सदन में तदर्थ प्रस्ताव द्वारा अनुज्ञा प्राप्त की जायेगी, परन्तु अध्यक्ष के अधीन रहते हुए उस समय तक ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं किया जायेगा जब तक कि विधेयक की प्रतिलिपियां प्रस्ताव करने के दिन से पूर्व दिनांक को सदस्यों को उपलब्ध न करा दी गयी हों।

(२) यदि ऐसे प्रस्ताव का विरोध किया जाय तो अध्यक्ष, यदि वे ठीक समझें, प्रस्ताव करने वाले सदस्य और प्रस्ताव का विरोध करने वाले सदस्य द्वारा संक्षिप्त व्याख्यात्मक वक्तव्य दिये जाने की अनुज्ञा देने के पश्चात् और बिना वाद-विवाद के प्रश्न रख सकेंगे:

                                परन्तु जब प्रस्ताव का इस आधार पर विरोध किया जाय कि वह विधेयक ऐसे विधान का सूत्रपात करता है जो सभा की विधायिनी क्षमता से परे है, तो अध्यक्ष उस पर पूर्णरूपेण चर्चा की अनुज्ञा दे सकेंगे।

       

१२४- विधेयक का पुरःस्थापन-

नियम ११४ अथवा नियम १२३, जैसी भी स्थिति हो, वर्णित प्रक्रिया के उपरान्त विधेयक "भार साधक सदस्य" द्वारा पुरःस्थापित किया जायगा।

१२५- विधेयक से सम्बद्ध पत्र मांगने की शक्ति-

विधेयक के पुरःस्थापन के उपरान्त कोई भी सदस्य यह मांग कर सकेंगे कि ऐसे पत्रों की प्रतिलिपियां, यदि कोई हों, जिन पर विधेयक आधारित हों और गोपनीय न हो सदन के पटल पर रख दी जायं।

१२६- विधेयकों का प्रकाशन-

विधेयक के पुरःस्थापन किये जाने के पश्चात् विधेयक, यदि वह पहले ही प्रकाशित नहीं किया जा चुका हो, यथाशीध्र गजट में प्रकाशित किया जायेगा।

१२७- राज्यपाल तथा राष्ट्रपति को विधेयक की प्रतिलिपि भेजना-

सभा में पुरःस्थापन के पश्चात् प्रत्येक पुरःस्थापित विधेयक की प्रतिलिपि प्रमुख सचिव द्वारा तुरन्त ही राज्यपाल तथा राष्ट्रपति  को सूचनार्थ भेज दी जायेगी।

(ख) पुरःस्थापन के उपरान्त प्रस्ताव

१२८- पुरःस्थापन के उपरान्त प्रस्ताव-

किसी विधेयक के पुरःस्थापन के उपरान्त या किसी अनुवर्ती अवसर पर विधेयक भार-साधक सदस्य निम्नलिखित प्रस्तावों में कोई एक प्रस्ताव कर सकेंगे, अर्थात्-

(क) उसे सभा द्वारा तत्काल ही या भविष्य में किसी ऐसे दिन, जिसे उसी समय निर्धारित किया जायेगा, विचारार्थ ले लिया जाय; या

(ख) उसे ऐसे अनुदेशों के सहित जो कि आवश्यक समझे जायं, सदन की प्रवर समिति को निर्दिष्ट कर दिया जाय; या

(ग) उसे ऐसे अनुदेशों के सहित जो कि आवश्यक समझे जायं, संयुक्त प्रवर समिति को निर्दिष्ट कर दिया जाय; या

(घ) उस पर राय जानने के प्रयोजन से परिचालित किया जायः

                परन्तु उप नियम (ग) के अन्तर्गत निर्देश का प्रस्ताव ऐसे विधेयक के सम्बन्ध में नहीं किया जायेगा जिसमें अनुच्छेद १९९ के खण्ड (१) के उपखण्ड (क) से (च) में उल्लिखित विषयों में से किसी के लिए उपबन्ध हो;

                किन्तु उस समय तक ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं किया जायेगा जब तक कि विधेयक की प्रतिलिपियां प्रस्ताव करने के दिन से तीन दिन पूर्व सदस्यों को उपलब्ध न करा दी गयी हों, और सदस्यों द्वारा की गयी आपत्ति अभिभावी होगी जब तक कि अध्यक्ष प्रस्ताव करने की अनुज्ञा न दे दें।

अनु0 199

१२९- विधेयकों के सिद्धान्तों पर चर्चा-

(१) उस दिन जब नियम १२८ में निर्दिष्ट कोई प्रस्ताव किया जाय या किसी अनुवर्ती दिन जिसके लिये चर्चा, स्थगित की जाय, विधेयक के सिद्धान्तों और उसके उपबन्धों पर सामान्य चर्चा की जा सकेगी, किन्तु विधेयक के ब्यौरे पर उससे अधिक चर्चा नहीं होगी जितनी कि उसके सिद्धान्तों की व्याख्या के लिये आवश्यक हो ।

(२) इस प्रक्रम पर विधेयक में संशोधन प्रस्तुत नहीं किये जा सकेंगे किन्तु यदि विधेयक भार-साधक सदस्य यह प्रस्ताव करें कि विधेयक-

(क) विचारार्थ लिया जाय, तो कोई सदस्य संशोधन के रूप में यह प्रस्ताव कर सकेंगे कि विधेयक ऐसे अनुदेशों के सहित जो कि आवश्यक समझे जायं एक प्रवर समिति या संयुक्त प्रवर समिति को निर्दिष्ट किया जाय या उस पर राय जानने के लिये उस तिथि तक जो उस प्रस्ताव में दी गयी हो, परिचालित किया जाय, अथवा

(ख) एक प्रवर समिति या संयुक्त प्रवर समिति को निर्दिष्ट किया जाय तो कोई सदस्य संशोधन के रूप में यह प्रस्ताव कर सकेंगे कि विधेयक को ऐसे अनुदेशों के सहित जो कि आवश्यक समझे जायं, यथास्थिति एक संयुक्त प्रवर समिति या प्रवर समिति को निर्दिष्ट किया जाय या विधेयक को राय प्राप्त करने के लिये उस तिथि तक जो उस प्रस्ताव में दी गयी हो, परिचालित किया जाय।

(३) (क) जब पूर्वगामी नियमों के अन्तर्गत किसी विधेयक को राय जानने के लिये परिचालित किये जाने पर रायें प्राप्त हो गयी हों तो राय प्राप्त होने की अन्तिम तिथि के उपरान्त यथासम्भव शीध्र प्रमुख सचिव द्वारा एक ऐसा विवरण पटल पर रखा जायेगा जिसमें रायों का सारांश दिया हो।

(ख) तदुपरान्त विधेयक भार-साधक सदस्य यदि वे अपने विधेयक पर इसके आगे कार्यवाही करना चाहते हों, प्रस्ताव करेंगे कि विधेयक एक प्रवर समिति या संयुक्त प्रवर समिति को निर्दिष्ट कर दिया जाय, यदि अध्यक्ष यह प्रस्ताव करने की अनुज्ञा न दे दें कि विधेयक पर तत्काल या किसी भावी तिथि को विचार किया जाय:

                        परन्तु इस नियम के अन्तर्गत संयुक्त प्रवर समिति की नियुक्ति के लिये कोई संशोधन या प्रस्ताव किसी ऐसे विधेयक के सम्बन्ध में नहीं किया जायेगा जिसमें अनुच्छेद १९९ के खण्ड (१) के उपखण्ड (क) से (च) में उल्लिखित विषयों में से किसी के लिए उपबन्ध हो।

अनु0 199

१३०- प्रवर समिति को गठित करने का प्रस्ताव-

जब सभा किसी विधेयक को प्रवर समिति को निर्दिष्ट करना निश्चित करे तो प्रवर समिति नियमानुसार गठित करने का प्रस्ताव किया जायेगा ।

१३१-व्यक्ति जो विधेयकों के सम्बन्ध में प्रस्ताव कर सकेंगे-

               

विधेयक के भार-साधक सदस्य के अतिरिक्त किसी अन्य सदस्य द्वारा यह प्रस्ताव प्रस्तुत नहीं किया जायेगा कि विधेयक पर विचार किया जाय या विधेयक को पारित किया जाय और विधेयक के भार-साधक सदस्य के अतिरिक्त किसी अन्य सदस्य द्वारा विधेयक के भार-साधक सदस्य द्वारा किये गये प्रस्ताव पर संशोधन के रूप के अतिरिक्त यह प्रस्ताव नहीं किया जायेगा कि विधेयक को प्रवर समिति या संयुक्त प्रवर समिति को निर्दिष्ट किया जाय या उस पर राय जानने के लिए उसे परिचालित किया जाय या पुनः परिचालित किया जाय:

                    परन्तु यदि विधेयक के भार-साधक सदस्य अपने विधेयक के सम्बन्ध में पुरःस्थापन के उपरान्त किसी अनुवर्ती प्रक्रम पर अगला प्रस्ताव प्रस्तुत करने में ऐसे कारणों से असमर्थ हों, जिन्हें अध्यक्ष पर्याप्त समझें तो वे किसी अन्य सदस्य को अध्यक्ष के अनुमोदन से उस विशेष प्रस्ताव को प्रस्तुत करने के लिये प्राधिकृत कर सकेंगे ।

व्याख्या-परन्तुक में दिये गये उपबन्धों के रहते हुए भी विधेयक भार-साधक सदस्य वही रहेंगे, जिन्होंने विधेयक पुरःस्थापित किया है।

(ग)        प्रवर समिति के प्रतिवेदन के उपस्थान के उपरान्त प्रक्रिया

१३२- प्रवर/संयुक्त प्रवर समिति के प्रतिवेदन के उपस्थान के उपरान्त प्रस्तुत किये जाने वाले प्रस्ताव-

(१) यथास्थिति किसी विधेयक पर सदन की प्रवर समिति अथवा सदनों की संयुक्त प्रवर समिति के अन्तिम प्रतिवेदन के उपस्थान के उपरान्त भार-साधक सदस्य प्रस्ताव कर सकेंगे कि-

(क) यथास्थिति सदन की प्रवर समिति द्वारा अथवा सदनों की संयुक्त प्रवर समिति द्वारा प्रतिवेदित रूप में विधेयक पर विचार किया जाय :

            परन्तु यदि प्रतिवेदन की प्रतिलिपि सदस्यों के उपयोग के लिए प्रस्ताव किये जाने के दिन से तीन दिन पहले उपलब्ध न कर दी गई हो तो कोई सदस्य इस तरह विचार किये जाने पर आपत्ति कर सकेंगे, यदि अध्यक्ष प्रतिवेदन पर विचार किये जाने की अनुमति न दें, तो ऐसी आपत्ति अभिभावी होगी, या

(ख) यथास्थिति सदन की प्रवर समिति द्वारा अथवा सदन की संयुक्त प्रवर समिति द्वारा प्रतिवेदित रूप में विधेयक उसी प्रवर समिति या एक नई प्रवर समिति या उसी संयुक्त प्रवर समिति या एक नई संयुक्त प्रवर समिति को, या तो:

    - परिसीमा के बिना; अथवा

    - केवल विशेष खण्डों या संशोधनों के संबंध में हो; अथवा

    - समिति को विधेयक में कोई विशेष या कोई अतिरिक्त उपबन्ध करने के अनुदेशों के साथ; या

(ग) यथास्थिति सदन की प्रवर समिति अथवा सदनों की संयुक्त प्रवर समिति द्वारा प्रतिवेदित रूप में विधेयक यथास्थिति उस पर राय या अतिरिक्त राय जानने के प्रयोजन के लिये परिचालित या पुनः परिचालित किया जाय।

(२) यदि विधेयक भार-साधक सदस्य यह प्रस्ताव करें कि यथास्थिति सदन की प्रवर समिति द्वारा अथवा सदनों की संयुक्त प्रवर समिति द्वारा प्रतिवेदित रूप में विधेयक पर विचार किया जाय तो कोई सदस्य संशोधन के रूप में यह प्रस्ताव कर सकेंगे कि विधेयक समिति को पुनः सौंपा जाय या उस पर राय या अतिरिक्त राय जानने के प्रयोजन के लिए परिचालित या पुनः परिचालित किया जाय।

१३३- वाद-विवाद की व्याप्ति-

इस प्रस्ताव पर कि प्रवर समिति द्वारा प्रतिवेदित रूप में विधेयक पर विचार किया जाय,वाद-विवाद प्रवर समिति के प्रतिवेदन के विचार तक और उस प्रतिवेदन में निर्दिष्ट विषयों तक या विधेयक के सिद्धान्त से सुसंगत किन्ही वैकल्पिक सुझावों तक सीमित रहेगा।

(घ) संयुक्त प्रवर समिति

१३४- संयुक्त प्रवर समिति के लिये प्रस्ताव-

(१) यदि कोई प्रस्ताव किसी विधेयक को दोनो सदनों की एक संयुक्त प्रवर समिति को निर्दिष्ट करने के लिए स्वीकृत हो जाय, तो प्रमुख सचिव इस निवेदन के साथ परिषद् को संदेश भेजेंगे कि परिषद् उस प्रस्ताव पर अपनी सहमति प्रकट करे, और यदि उसकी सहमति हो तो संयुक्त प्रवर समिति में कार्य करने के लिये अपेक्षित संख्या में अपने सदस्यों की नियुक्ति कर दें।

(२) यदि इस तात्पर्य का सन्देश सभा में प्राप्त हो कि परिषद् सहमत नही है तो संयुक्त प्रवर समिति को कोई निर्देशन नही होगा।

१३५- संयुक्त प्रवर समिति के निर्देशन के लिये परिषद् द्वारा प्रस्ताव-

(१) यदि परिषद् में कोई प्रस्ताव किसी विधेयक की दोनों सदनों की संयुक्त प्रवर समिति को निर्दिष्ट करने के लिये स्वीकृत हो और उसका संदेश प्रमुख सचिव को प्राप्त हो तो प्रमुख सचिव ऐसे संदेश की सूचना सदन को देंगे।

(२) परिषद् से ऐसे संदेश के प्राप्त होने के पश्चात् किसी भी समय सरकारी विधेयक की दशा में कोई मंत्री और असरकारी सदस्य के विधेयक की दशा में कोई सदस्य प्रस्ताव कर सकेंगे कि परिषद् द्वारा स्वीकार प्रस्ताव स्वीकार किया जाय।

(३) यदि सभा सहमत हो तो संयुक्त प्रवर समिति के लिये सभा के प्रतिनिधियों की अपेक्षित संख्या का निर्वाचन नियम २६१ के उपबन्धों के अनुसार करने के लिये प्रस्ताव किया जायगा। तदन्तर परिषद् को एक संदेश भेज दिया जायगा जिसमें परिषद् द्वारा स्वीकृत प्रस्ताव पर सभा की सहमति तथा संयुक्त प्रवर समिति के लिए सभा द्वारा निर्वाचित सदस्यों के नामों की सूचना दी जायेगी।

(४) यदि सभा परिषद् द्वारा स्वीकृत प्रस्ताव से सहमत न हो तो परिषद् के पास असहमति की सूचना भेज दी जायेगी।

(ङ) खण्डों आदि में संशोधन तथा विधेयकों पर विचार

१३६- विधेयकों का खंडशः प्रस्तुत किया जाना-

(१) जब यह प्रस्ताव स्वीकृत हो जाय कि विधेयक विचारार्थ लिया जाय तो विधेयक के प्रत्येक खण्ड के सम्बन्ध में यह प्रस्ताव किया हुआ समझा जायगा कि वह खण्ड विधेयक का अंश माना जाय। इन नियमों में किसी बात के होते हुए भी अध्यक्ष के स्वविवेक में होगा कि विधेयक या विधेयक के किसी भाग को खण्ड प्रतिखण्ड सभा के समक्ष रखें। अध्यक्ष प्रत्येक खण्ड को पृथक-पृथक लेंगे और जब उसमें सम्बद्व संशोधन का निस्तारण अनुवर्ती नियमों के उपबन्धों के अनुसार हो जाय तब यह प्रश्न उपस्थित करेंगे कि यह खण्ड या यथास्थिति यह संशोधित खण्ड विधेयक का अंश माना जाय।

(२) अध्यक्ष, यदि वे ठीक समझें ऐसे खण्डों के समूह को एक प्रश्न के रूप में रख सकेंगे जिन पर कोई संशोधन प्रस्तुत नही किये गये हों:

                परन्तु यदि कोई सदस्य प्रार्थना करे कि कोई खण्ड अलग से रखा जाय तो अध्यक्ष उस खण्ड को अलग से रखेंगे ।

१३७- किसी खण्ड का स्थगन-

अध्यक्ष, यदि ठीक समझें तो किसी खण्ड पर विचार स्थगित कर सकेंगे।

१३८- अनुसूची पर विचार-

अनुसूची या अनुसूचियों पर यदि कोई हों, खण्डों पर विचार होने के बाद विचार किया जायगा। अनुसूचियां अध्यक्ष पीठ से रखी जायेंगी और वे उस रीति से संशोधित की जा सकेंगी जैसे कि खण्ड और नयी अनुसूचियों पर विचार मूल अनुसूचियों के विचार के बाद किया जायेगा। तब यह प्रश्न रखा जायगा "कि यह अनुसूची या यथास्थिति, यह संशोधित अनुसूची, विधेयक का अंश मानी जाय":

                परन्तु अध्यक्ष अनुसूची या अनुसूचियों पर, यदि कोई हों, खण्डों के निस्तीर्ण किये जाने के पहले या किसी खण्ड के साथ या अन्यथा जैसे कि वे ठीक समझें विचार किये जाने की अनुज्ञा दे सकेंगे।

१३९- संशोधन की सूचना-

(१) यदि विधेयक के किसी खण्ड या अनुसूची में किसी संशोधन की सूचना उस दिन से छत्तीस घण्टे पूर्व न दी गई हो जिस दिन कि विधेयक पर विचार किया जाना हो, तो कोई भी सदस्य संशोधन के प्रस्तुत किये जाने पर आपत्ति कर सकेंगे, और यदि अध्यक्ष संशोधन के प्रस्तुत किये जाने की अनुमति न दे दें तो ऐसी आपत्ति अभिभावी होगी:

                परन्तु किसी सरकारी विधेयक की अवस्था में ऐसा संशोधन, जिसकी सूचना विधेयक भार-साधक सदस्य से मिली हो, इस कारण व्यपगत नहीं होगा कि विधेयक भार-साधक सदस्य, मंत्री या सदस्य नहीं रहे हैं और ऐसा संशोधन विधेयक के नये विधेयक भार-साधक सदस्य के नाम में छापा जायगा:

                किन्तु ऐसे संशोधनों के लिये जो पूणर्तया शाब्दिक हों, या ऐसे संशोधनों पर, जो आनुषंगिक हों या उनके संबंध में हों जो स्वीकृत किये जा चुके हों, पूर्व सूचना की आश्यकता नहीं होगी।

(२) यदि समय हो तो प्रमुख सचिव सदस्यों को, समय-समय पर, उन संशोधनों की सूचियां उपलब्ध करेंगे, जिनकी सूचनाएं प्राप्त हो चुकी हों।

१४०- संशोधनों की ग्राह्यता की शर्तें-

किसी विधेयक के खण्डों या अनुसूचियों में संशोधनों की ग्राह्यता निम्नलिखित शर्तों के अधीन होंगी:-

(१) संशोधन विधेयक की व्याप्ति के भीतर होगा और जिस खण्ड से उसका संबंध हो उसके विषय से सुसंगत होगा।

(२) संशोधन सभा के उसी प्रश्न पर किसी पूर्व विनिश्चय से असंगत नहीं होगा।

(३) संशोधन ऐसा नहीं होगा कि जिससे वह खण्ड जिसे संशोधित करने की उसमें प्रस्थापना हो, दुर्बोध या व्याकरण के अनुसार अशुद्ध हो जाय।

(४) यदि संशोधन में बाद के किसी संशोधन या अनुसूची की ओर निर्देश किया जाय या उसके बिना वह बोधगम्य न हो तो प्रथम संशोधन का प्रस्ताव करने से पहले बाद के संशोधन या अनुसूची की सूचना दी जायेगी, जिससे कि संशोधन माला पूर्णरूप में बोधगम्य हो जाय।

(५) अध्यक्ष वह क्रम निर्धारित करेंगे जिसमें संशोधन प्रस्तुत किये जायेंगे।

(६) अध्यक्ष ऐसे संशोधन की अनुज्ञा देने से इंकार कर सकेंगे जो उनकी राय में तुच्छ या अर्थहीन हों।

(७) जिस संशोधन की अध्यक्ष पहले अनुज्ञा दे चुके हों उसमें संशोधन प्रस्तुत किया जा सकेगा।

१४१- संशोधन की सूचना के साथ राष्ट्रपति की मंजूरी या राज्यपाल की सिफारिश का संलग्न किया जाना-

(१) यदि शासन कोई ऐसा संशोधन प्रस्तावित करना चाहे जो संविधान के अन्तर्गत राष्ट्रपति की पूर्व मंजूरी अथवा राज्यपाल की सिफारिश के बिना प्रस्तुत नहीं किया जा सकता हो तो वह आवश्यक सूचना के साथ ऐसी मंजूरी या सिफारिश की एक प्रति संलग्न करेगा और सूचना तब तक वैध नहीं होगी जब तक कि वह आवश्यकता पूरी न हो जाय।

(२) यदि कोई असरकारी सदस्य किसी ऐसे, संशोधन की सूचना दे जो अध्यक्ष की राय में राष्ट्रपति की पूर्व मंजूरी अथवा राज्यपाल की सिफारिश के बिना प्रस्तावित नहीं किया जा सकता हो, तो अध्यक्ष सूचना की प्राप्ति के उपरान्त यथासंभव शीध्र उस संशोधन को राष्ट्रपति अथवा राज्यपाल को यथास्थिति, निर्दिष्ट कर देंगे।

अनु0 207 व 304

१४२- संशोधनों का क्रम-

(१) संशोधनों पर विधेयक के खण्डों के क्रम के अनुसार जिनसे क्रमशः उनका संबंध हो, साधारणतया विचार किया जायगा परन्तु अध्यक्ष को अभिसूचित संशोधनों के प्रवरण की शक्ति होगी।

(२) अध्यक्ष, यदि वे ठीक समझें किसी खण्ड के एक से संशोधनों को एक प्रश्न के रूप में रख सकेंगे :

                परन्तु यदि कोई सदस्य प्रार्थना करे कि कोई संशोधन अलग से रखा जाय तो अध्यक्ष उस संशोधन का अलग से रखेंगे:

                       किन्तु समय और पुनरावृति बचाने के अभिप्राय से परस्पर निर्भर संशोधनों के समूह पर केवल एक चर्चा की अनुमति दी जा सकेगी ।

१४३- संशोधनों की वापसी-

प्रस्तुत किया गया कोई संशोधन प्रस्तुत करने वाले सदस्य की प्रार्थना पर सदन की अनुमति से वापस लिया जा सकेगा किन्तु अन्यथा नहीं। यदि किसी संशोधन में संशोधन प्रस्थापित किया गया हो तो मूल संशोधन तब तक वापस नही लिया जायेगा जब तक उसमें प्रस्थापित संशोधन निस्तीर्ण न कर दिया जाय।

१४४- विधेयक का प्रथम खण्ड, प्रस्तावना और शीषर्क-

विधेयक का प्रथम खण्ड, प्रस्तावना यदि कोई हो और शीर्षक तब तक स्थगित रहेंगे जब तक कि अन्य खण्डों और अनुसूचियों (नये खण्डों और नयी अनुसूचियों सहित) का निस्तारण न हो जाय और तदुपरान्त अध्यक्ष यह प्रश्न उपस्थित करेंगे "कि प्रथम खण्ड या प्रस्तावना या शीषर्क (अथवा यथास्थिति संशोधित प्रथम खण्ड, प्रस्तावना या शीर्षक) को विधेयक का अंश माना जाय"।

(च) विधेयकों का पारण तथा प्रमाणीकरण

१४५- विधेयकों का पारण-

(१) जब यह प्रस्ताव कि विधेयक पर विचार किया जाय स्वीकार हो गया हो और विधेयक में कोई संशोधन न हुआ हो तब विधेयक के भार-साधक सदस्य तुरन्त ही यह प्रस्ताव कर सकेंगे कि विधेयक पारित किया जाय ।

(२) यदि विधेयक में कोई संशोधन किया जाय तो कोई भी सदस्य ऐसे किसी प्रस्ताव के उसी दिन किये जाने पर आपत्ति कर सकेंगे कि विधेयक को पारित किया जाय और यदि अध्यक्ष इस प्रस्ताव को प्रस्तुत करने की अनुज्ञा न दे दें तो ऐसी आपत्ति अभिभावी होगी।

(३) ऐसे प्रस्ताव पर कोई संशोधन प्रस्तुत नहीं किया जायेगा।

१४६- वाद-विवाद की व्याप्ति-

इस प्रस्ताव पर कि विधेयक पारित किया जाय चर्चा विधेयक के समर्थन या उसकी अस्वीकृति के प्रतर्कों तक सीमित होगी।

१४७- विधेयकों में औपचारिक संशोधन-

जब कोई विधेयक सभा द्वारा पारित हो जाय तब प्रमुख सचिव खण्डों को पुनरांकित करेंगे उनकी उपांतिक टिप्पणियों को पुनरीक्षित एवं पूर्ण करेंगे, उनमें केवल ऐसे औपचारिक, शाब्दिक अथवा आनुषांगिक संशोधन करेंगे, जो आवश्यक हों और ऐसी त्रुटियों का शोधन करेंगे जो उनको असावधानता के कारण रह गई प्रतीत हों।

१४८- विधेयकों का परिषद् को पहुंचाया जाना-

(१) प्रमुख सचिव विधेयक की चार प्रतियां अध्यक्ष को प्रस्तुत करेंगे और अध्यक्ष और उनकी अनुपस्थिति में अविलम्वनीय अवस्था में प्रमुख सचिव, अध्यक्ष के कृते, उन्हें निम्न रूप में प्रमाणित करेंगे:-

                       "इस विधेयक को उत्तर प्रदेश विधान सभा ने...........................20.............................को पारित किया।

            दिनांक...................................................     

                                                                                                                                               अध्यक्ष।’’

                       परन्तु यदि अनुच्छेद 199 के अर्थ में वह एक धन विधेयक हो तो विधेयक के अन्त में अध्यक्ष का प्रमाण-पत्र निम्न प्रकार से अंकित होगा:-

                       ’’मैं एतद्द्वारा प्रमाणित करता हूं कि यह विधेयक भारत के संविधान के अनुच्छेद 199 के अर्थ के अन्तर्गत एक धन विधेयक है।

            दिनांक ....................................                                  अध्यक्ष।’’

(2) उक्त प्रतियों में से तीन प्रतियां परिषद् को उसके विचारार्थ भेजी जायेंगी।

अनु0 197, 198, 199 (4)

(छ) धन विधेयकों के अतिरिक्त अन्य विधेयकों के परिषद् से प्रत्यावर्तित होने पर प्रक्रिया

१४९- संशोधन के बिना पारित विधेयकों के बारे में परिषद् से संदेश-

यदि धन विधेयक के अतिरिक्त सभा द्वारा पारित तथा परिषद् को पहुंचाया गया कोई विधेयक परिषद् द्वारा बिना किसी संशोधन के पारित कर दिया जाये तो परिषद् से प्राप्त तत्संबंधी संदेश प्रमुख सचिव द्वारा सदन को, यदि उसका उपवेशन हो रहा हो तो तुरन्त, अन्यथा आगामी उपवेशन में प्रतिवेदित किया जायेगा ।

१५०- परिषद् से विधेयक का प्रत्यावर्तन-

(१) जब धन विधेयक के अतिरिक्त कोई विधेयक जो सभा में आरंम्भ हुआ हो परिषद् द्वारा अस्वीकृत हो जाय या उस तिथि से जब विधेयक परिषद् के समक्ष रखा गया था परिषद् द्वारा बिना उसके पारित हुए तीन माह से अधिक व्यतीत हो जाय, तो प्रमुख सचिव उपर्युक्त तथ्यों की सूचना सदन को देंगे और तब सभा पूर्वगामी नियमों में विधेयक के तृतीय पठन के लिये विहित प्रक्रिया के अनुसार विधेयक को पुनः पारित करने के लिये कार्यवाही करेगी।

(२) यदि विधेयक परिषद् द्वारा संशोधन सहित पारित किया जाय तो संशोधनों सहित विधेयक यथाशीध्र पटल पर रखा जायेगा और संशोधनों सहित विधेयक की प्रतिलिपियां सदस्यों को वितरित किये जाने के उपरान्त सरकारी विधेयक की अवस्था में कोई मंत्री अथवा किसी और अवस्था में कोई सदस्य दो दिन की सूचना के पश्चात् या अध्यक्ष की सम्मति से बिना सूचना पर भी प्रस्ताव कर सकेंगे कि परिषद् द्वारा किये गये संशोधनों पर विचार किया जाये ।

अनु0 197

१५१- संशोधनों पर विचार करने की प्रक्रिया-

(१) यदि यह प्रस्ताव कि परिषद् द्वारा किये गये संशोधनों पर विचार किया जाये, स्वीकृत हो जाय, तो अध्यक्ष संशोधनों को इस प्रकार सदन के समक्ष विचारार्थ रखेंगे जिसे वे सुविधाजनक समझें।

(२) इस प्रक्रम पर केवल ऐसे संशोधन प्रस्तुत किये जा सकेंगे जो परिषद् द्वारा किये गये संशोधनों के विषय से सुसंगत हों अथवा उनके आनुषंगिक या वैकल्पिक हों।

(३) यदि सदन परिषद् द्वारा किये गये संशोधनों से सहमत हो तो वह परिषद् को तत्संबंधी संदेश भेजेगा किन्तु यदि वह असहमत हो या विधेयक में कोई अग्रेतर संशोधन स्वीकार करें तो सदन, यथास्थिति, विधेयक को या अग्रेतर संशोधित विधेयक को पुनः पारित करके तत्संबंधी संदेश सहित परिषद् को लौटायेगा।

अनु0 197

१५२- संशोधनों के विचार की प्रक्रिया-

(१) यदि विधेयक परिषद् द्वारा सभा को पुनः इस संदेश के साथ लौटाया जाय कि परिषद् उस संशोधन या उन संशोधनों पर आगृह, करती है जिनसे सदन पहले असहमत हो चुका है तो विधेयक दोनों सदनों द्वारा उस रूप में पारित समझा जायेगा जिसमें कि वह सभा द्वारा दूसरी बार पारित हुआ था।

(२) यदि नियम १५० (१) के अधीन प्रस्ताव स्वीकृत हो जाय कि विधेयक, जैसा मूलतः पारित हुआ है, पारित किया जाय, तो विधेयक पुनः परिषद् को पहुंचाया जायगा और यदि-

(क) परिषद् द्वारा विधेयक अस्वीकार कर दिया जाता है, अथवा

(ख) परिषद् के समक्ष विधेयक रखे जाने की तिथि से, उससे विधेयक पारित हुए बिना एक मास से अधिक समय व्यतीत हो जाता है, अथवा

(ग) परिषद् द्वारा विधेयक संशोधनों सहित पारित होता है, तो उप नियम (क) और (ख) की दशा में विधेयक सदनों द्वारा उस रूप में पारित समझा जायेगा जिसमें कि वह सभा द्वारा दूसरी बार पारित किया गया था। उप नियम (२) (ग) की दशा में सभा की सहमति या असहमति नियम १५१ में विहित प्रक्रिया के अनुसार प्राप्त की जायेगी।

अनु0 197

(ज) धन विधेयक

१५३- धन विधेयकों पर परिषद् की सिफारिश-

यदि सभा द्वारा पारित तथा परिषद् को पहुंचाया गया कोई धन विधेयक सभा को बिना सिफारिश के लौटा दिया जाय या परिषद् में उसकी प्राप्ति के दिनांक से १४ दिन की अवधि समाप्त हो जाय तो तत्संबंधी सूचना प्रमुख सचिव द्वारा सदन को उपवेशन होने की दशा में तुरन्त, अन्यथा सदस्यों को पत्र द्वारा दी जायेगी।

अनु0 198

१५४- परिषद् द्वारा की गयी सिफारिशों पर विचार-

(१) यदि सभा द्वारा पारित तथा परिषद् को पहुंचाया गया कोई धन विधेयक परिषद् द्वारा सिफारिश किये गये संशोधनों सहित सदन को लौटाया जाय तो वह प्राप्त होने पर पटल पर रखा जायेगा।

(२) यदि विधेयक परिषद् द्वारा सिफारिशों सहित लौटाया जाय तो सिफारिशों सहित विधेयक यथाशीघ्र पटल पर रखा जायेगा और सिफारिश सहित विधेयक की प्रतिलिपियां सदस्यों को वितरित किये जाने के उपरान्त सरकारी विधेयक की अवस्था में कोई मंत्री अथवा किसी अन्य अवस्था में कोई सदस्य दो दिन की सूचना के पश्चात् या अध्यक्ष की सम्मति से बिना सूचना पर भी प्रस्ताव कर सकेंगे कि परिषद् द्वारा की गयी सिफारिशों पर विचार किया जाय।

अनु0 198

१५५- परिषद् द्वारा सिफारिश किये गये संशोधन पर विचार करने की प्रक्रिया-

(१) यदि यह प्रस्ताव कि परिषद् द्वारा की गयी सिफारिशों पर विचार किया जाय, स्वीकृत हो जाय, तो अध्यक्ष परिषद् द्वारा की गयी ऐसी सिफारिशों को सदन के सामने ऐसी रीति से रखेंगे, जिसे वे ठीक समझें।

(२) यदि सदन परिषद् द्वारा की गयी सिफारिशों को स्वीकार कर ले तो विधेयक परिषद् द्वारा की गयी ऐसी सिफारिशों सहित जो सदन द्वारा स्वीकृत हैं दोनों सदनों द्वारा पारित किया गया समझा जायेगा।

१५६- सदनों के मध्य असहमति-

यदि सदन परिषद् की किसी सिफारिश को स्वीकार न करे,तो विधेयक दोनों सदनों द्वारा उस रूप में पारित समझा जायेगा जिसमें कि वह सभा द्वारा परिषद् की किसी सिफारिश के बिना पारित हुआ था।

अनु0 198

१५७- सभा के विनिश्चयों का परिषद् को संचार-

परिषद् की सिफारिशों पर सभा के विचार के परिणाम की सूचना देते हुए एक संदेश परिषद् को भेजा जायेगा।

(झ) सामान्य

१५८- विधेयक के वर्ष को अनुमति के वर्ष  के अनुरूप करने की अध्यक्ष की शक्ति-

पूर्वगामी वर्ष में पुरःस्थापित किन्तु अनुवर्ती वर्ष में पारित विधेयकों की दशा में अथवा ऐसे विधेयकों की दशा में जो उसी वर्ष पारित हों किन्तु जिनके लिये अनुवर्ती वर्ष में अनुमति दिये जाने की संभावना हो, अध्यक्ष विधेयक के वर्ष को परिवर्तित कर देंगे जिससे कि वह पारण के वर्ष के अनुरूप या उस वर्ष के अनुरूप हो जाय जिसमें कि यथास्थिति, राष्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा अनुमति मिलने की संभावना हो।

१५९- विधेयक पर अनुमति-

जब सभा में पुरःस्थापित विधेयक, संविधान के उपबन्धों के अनुसार दोनों सदनों द्वारा पारित हो जाय, तब प्रमुख सचिव उसमें शाब्दिक और आनुषंगिक संशोधन, यदि कोई हों, करेंगे तथा उस पर अध्यक्ष के हस्ताक्षर और यदि वह धन विधेयक हो तो अनुच्छेद १९९(४) के अन्तर्गत आवश्यक प्रमाण भी अंकित हो जाने के उपरान्त वह विधेयक तीन प्रतियों में राज्यपाल की अनुमति के लिये प्रस्तुत किया जायेगा।

अनु0 199(4) तथा 200

१६०- शाब्दिक संशोधनों का विवरण-

नियम-१५९ के अधीन हस्ताक्षरित प्रति के साथ राज्यपाल को एक विवरण भी प्रस्तुत किया जायेगा जिसमें विधेयक में किये गये ऐसे शाब्दिक और आनुषंगिक संशोधन या त्रुटियों का शोधन दर्शाय़ा जायेगा जो नियम १४७ और १५९ के अन्तर्गत किये गये हैं। विधेयक में किये गये इन परिवर्तनों की प्रतिलिपि राज्यपाल की अनुमति की घोषणा से पूर्व प्रमुख सचिव द्वारा पटल पर रखी जायेगी।

(ञ) परिषद् में पुरःस्थापित विधेयकों के सम्बन्ध में प्रक्रिया

१६१- विधेयक जिनको परिषद् ने पारित किया है-

जब कोई विधेयक परिषद् में पुर:स्थापित तथा पारित हुआ हो और सभा में प्राप्त हो तो विधेयक प्रमुख सचिव द्वारा यथाशीघ्र पटल पर रखा जायगा।

१६२- विचार करने के लिये प्रस्ताव की सूचना-

नियम १६१ के अन्तर्गत विधेयक के पटल पर रखे जाने तथा उसकी प्रतिलिपियां सदस्यों को वितरित किये जाने के उपरान्त किसी सरकारी विधेयक की दशा में कोई मंत्री या किसी अन्य दशा में कोई सदस्य इस प्रस्ताव की सूचना दे सकेंगे कि विधेयक विचारार्थ लिया जाय।

१६३- विचार करने के लिये प्रस्ताव-

जब तक कि अध्यक्ष अन्यथा निदेश न दें, नियम १६२ में उल्लिखित प्रस्ताव सूचना प्राप्त होने के दिनांक से दो दिन के उपरान्त किसी दिन कार्य-सूची में सम्मिलित एवं सदन में प्रस्तुत किया जा सकेगा।

१६४- चर्चा-

उस दिन जब ऐसा प्रस्ताव किया जाय या किसी अनुवर्ती दिन जिसके लिये चर्चा स्थगित की जाय विधेयक के सिद्वान्त और उसके सामान्य उपबन्धों पर चर्चा हो सकेगी, किन्तु विधेयक के सविस्तार विवरणों पर उससे अधिक चर्चा नहीं होगी जितनी कि उसके सिद्वान्तों की व्याख्या के लिये आवश्यक हो।

१६५- प्रवर समिति को निर्देशन-

कोई भी सदस्य (यदि विधेयक पहले ही संयुक्त प्रवर समिति को निर्दिष्ट न कर दिया गया हो) संशोधन के रूप में यह प्रस्ताव कर सकेंगे कि विधेयक एक प्रवर समिति को निर्दिष्ट कर दिया जाय और यदि ऐसा प्रस्ताव स्वीकृत हो जाय तो विधेयक तदनुसार निर्दिष्ट कर दिया जायेगा और तब सभा में प्रारम्भ होने वाली विधेयकों की प्रवर समिति से सम्बद्व नियम प्रवृत्त होंगे।

१६६- विधेयकों पर विचार एवं उनका पारण-

यदि प्रस्ताव कि विधेयक पर विचार किया जाय, स्वीकृत हो जाय, तो विधेयक विचारार्थ ले लिया जायेगा और तब विधेयकों के संशोधनों पर विचार से सम्बद्ध नियमों के उपबन्धों तथा विधेयकों के पारण से सम्बद्व अनुवर्ती प्रक्रिया लागू होगी।

१६७- संशोधन रहित पारित विधेयक-

यदि विधेयक संशोधन के बिना पारित हो जाय तो विधेयक एतदविषयक संदेश के साथ परिषद् को भेजा जायेगा कि सभा विधेयक से बिना किसी संशोधन के सहमत है।

१६८- संशोधनों सहित पारित विधेयक-

(१) यदि विधेयक संशोधनों सहित पारित हो जाय तो विधेयक इस संदेश के साथ लौटाया जायेगा कि परिषद् संशोधनों को स्वीकार कर ले:-

(क) यदि परिषद् सभा द्वारा किये गये संशोधनों या उनमें से किसी संशोधन से असहमत हो या सभा द्वारा किये गये संशोधनों मे से किसी संशोधन को अग्रेतर संशोधनों के साथ स्वीकार करे या सभा द्वारा किये गये संशोधनों के स्थान में अन्य संशोधन प्रस्थापित करे, तो यथास्थिति असहमति की सूचना या संशोधन, यदि कोई हो, प्रमुख सचिव द्वारा प्राप्त होने पर विधेयक के साथ पटल पर रखे जायेंगे।

(ख) विधेयक के इस प्रकार पटल पर रखे जाने पर तथा संशोधनों या असहमति की सूचना सहित उसकी प्रतिलिपियां सदस्यों को वितरित किये जाने के उपरान्त सरकारी विधेयक की अवस्था में कोई मंत्री अथवा किसी अन्य अवस्था में कोई सदस्य दो दिन की सूचना के पश्चात् या अध्यक्ष की सम्मति से बिना सूचना के प्रस्ताव कर सकेंगे कि उस पर परिषद् द्वारा सुझाये या स्वीकार किये गये संशोधनों सहित या बिना, विचार किया जाये।

(ग) तदुपरान्त नियम १५१ में संशोधनों पर विचार के लिये विहित प्रक्रिय़ा लागू होगी।

(घ) इस प्रकार के विचार के उपरान्त विधेयक इस संदेश के साथ लौटाया जायेगा कि सभा विधेयक को ऐसे संशोधनों सहित या ऐसे संशोधनो के बिना, यदि कोई हो, जो किये गये हो, या जिनका सुझाव दिया गया हो, या जिनसे परिषद् सहमत हो, पारित करती है, अथवा यह मूलतः प्रस्थापित संशोधनों पर आग्रह करती है। ऐसी अवस्था में परिषद् सभा द्वारा पारित विधेयक पर विचार कर सकेगी, किन्तु यदि परिषद् सभा द्वारा पारित विधेयक से फिर भी असहमत हो तो विधेयक दोनों सदनों द्वारा पारित हुआ समझा जायगा।

(2) परिषद् को इस तरह लौटाया गया विधेयक अध्यक्ष द्वारा निम्न प्रकार से प्रमाणित किया जायेगा:

    ’’यह विधेयक........................20...........................को सभा द्वारा संशोधित रूप में पारित किया गया है।

    दिनांक................................20.............................

    अध्यक्ष।’’

(ट) संविधान के अनुच्छेद २०० और २०१ के अन्तर्गत लौटाये गये विधेयकों पर पुनर्विचार

१६९- राज्यपाल का सन्देश-

(१) जब सभा द्वारा पारित कोई विधेयक सभा को राज्यपाल द्वारा एक सन्देश के साथ लौटाया जाय जिसमें यह कहा गया हो कि सभा विधेयक पर अथवा उसके किन्ही उल्लिखित उपबन्धों पर अथवा किन्ही संशोधनों पर जिनकी संदेश में सिफारिश की गई हो, पुनर्विचार करें तो अध्यक्ष राज्यपाल के संदेश को सभा में, यदि वह सत्र में हो, पढ़कर सुनायेंगे अथवा यदि सभा, सत्र में न हो तो यह निर्देश देंगे कि उसकी सूचना सदस्यों को पत्र द्वारा दी जाय।

(२) उसके पश्चात् विधेयक को सभा द्वारा पारित और राज्यपाल द्वारा पुनर्विचार के लिये लौटाये गये रूप में प्रमुख सचिव द्वारा पटल पर रखा जायेगा।

१६९-क-संशोधनों पर विचार के प्रस्ताव की सूचना-

विधेयक के इस प्रकार पटल पर रखे जाने के पश्चात् किसी सरकारी विधेयक की दशा में कोई मंत्री या किसी अन्य दशा कोई सदस्य यह प्रस्ताव रखने के अभिप्राय की सूचना दे सकेंगे कि सन्देश में दिये निदेशों के परिप्रेक्ष्य में विधेयक पर पुनर्विचार किया जाय।

१६९-ख-पुनर्विचार करने का प्रस्ताव पुनर्विचार  का प्रस्ताव-

कार्य-सूची में जिस दिन रखा गया हो और वह दिन जब तक अध्यक्ष अन्यथा निर्देश न दें सूचना प्राप्ति के दो दिन से पहले नहीं होगा, उस दिन सूचना देने वाले सदस्य यह प्रस्ताव कर सकेंगे कि सन्देश में दिये गये निदेशों के या संशोधनों के परिप्रेक्ष्य में विधेयक पर पुनर्विचार किया जाय।

१६९-ग-वाद-विवाद की व्याप्ति-

ऐसे प्रस्ताव पर वाद-विवाद राज्यपाल के सन्देश में निर्दिष्ट विषयों तक या राज्यपाल द्वारा सिफारिश किये गये किसी संशोधन के विषय मे संगत किसी सुझाव तक ही सीमित रहेगा।

१६९-घ-संशोधनों पर विचार-

(१) यदि यह प्रस्ताव कि सन्देश में दिये गये निदेशों या संशोधनों के परिप्रेक्ष्य में विधेयक पर पुनर्विचार किया जाय, पारित हो जाय तो कोई सदस्य अध्यक्ष द्वारा पुकारे जाने पर विधेयक में संशोधन प्रस्तुत कर सकेगा जिसकी उसने पहले से सूचना दी हो।

(२) जब राज्यपाल द्वारा विशेष संशोधनों की सिफारिश की जाय तो राज्यपाल द्वारा सिफारिश किये गये संशोधनों के विषय से सुसंगत संशोधन प्रस्तुत किये जा सकते हैं, किन्तु विधेयक में कोई अन्य संशोधन नहीं किये जा सकते जब तक कि वे राज्यपाल द्वारा सिफारिश किये गये संशोधन के आनुषंगिक,प्रासंगिक या वैकल्पिक संशोधन न हों।

(३) यदि राज्यपाल द्वारा किसी विशेष संशोधन की सिफारिश न की जाय तो किसी ऐसे संशोधन को प्रस्तुत नहीं किया जा सकेगा जो विधेयक के पुनर्विचार की सिफारिश करने वाले सन्देश की व्याप्ति में न हो।

(४) राज्यपाल द्वारा सिफारिश किये संशोधनों, यदि कोई हों, और ऐसे अन्य संशोधनों, जो पुनर्विचार किये जाने के लिये राज्यपाल के संदेश की व्याप्ति में हों, पर अध्यक्ष द्वारा प्रश्न उपस्थित किया जायेगा।

१६९-ङ -विधेयकों का पुनः पारण-

जब सभी संशोधन निपटाये जा चुके हों, तो नियम १६९-क के अधीन प्रस्ताव की सूचना देने वाले सदस्य यह प्रस्ताव कर सकेंगे कि विधेयक को, यथास्थिति, सभा द्वारा मूलतः पारित रूप में अथवा संशोधित रूप में पुनःपारित किया जाय।

१६९-च-संदेश से सभा की असहमति-

यदि यह प्रस्ताव पारित न हो कि सन्देश में अन्तर्निहित निदेशों के प्रकाश में राज्यपाल द्वारा लौटाये गये विधेयक पर पुनर्विचार किया जाय तो नियम १६९-क के अधीन प्रस्ताव की सूचना देने वाले सदस्य तत्काल यह प्रस्ताव कर सकेंगे कि सभा द्वारा मूलरूप में पारित विधेयक को पुनः किसी संशोधन के बिना पारित किया जाय।

१६९-छ-संविधान के अनुच्छेद-२०१ के परन्तुक के अन्तर्गत सन्देश सहित लौटाये गये विधेयकों पर पुनर्विचार-

जब कोई विधेयक जो सभा द्वारा पारित हो चुका हो, सभा को संविधान के अनुच्छेद २०१ के परन्तुक के उपबन्धों के अनुसार पुनर्विचार करने के सन्देश सहित लौटाया जाय तो उसके संबंध में उस प्रक्रिया का अनुसरण किया जायेगा, जो सभा द्वारा पारित उन विधेयकों के संबंध में अनुसरित की जाती है जो संविधान के अनुच्छेद २०० के परन्तुक के अन्तर्गत पुनर्विचार के लिये लौटाये जाते है और उपर्युक्त नियमों के उपबन्धों एवं अनुकूलनों के अधीन रहते हुए प्रवृत होंगे, जो रूपभेद, परिवर्धन या लोप के रूप में हो सकते हैं, जिन्हें अध्यक्ष आवश्यक या इष्टकर समझें।

(ट ट) सभा द्वारा पुनः पारित विधेयक का प्रमाणीकरण

१६९-ज-सभा द्वारा पुनः पारित विधेयक का प्रमाणीकरण-

जब कोई विधेयक सभा द्वारा पुनः पारित किया जाय तथा वह सभा के कब्जे में हो तब विधेयक पर अध्यक्ष द्वारा हस्ताक्षर किये जायेंगे और उसे राज्यपाल के समक्ष निम्नलिखित रूप में प्रस्तुत किया जायगा:

        "उक्त विधेयक संविधान के अनुच्छेद २०० के प्रथम परन्तुक/२०१ के परन्तुक के अनुसरण में सभा द्वारा बिना संशोधन के मूल रूप में/निम्नलिखित संशोधनों सहित पुनः पारित किया गया है।"

(ठ) विधेयकों का स्थगन और वापसी तथा अपास्त विधेयक

१७०- विधेयक पर वाद-विवाद का स्थगन-

सदन में चर्चाधीन विधेयक के किसी प्रक्रम पर अध्यक्ष की सम्मति से यह प्रस्ताव प्रस्तुत किया जा सकेगा कि विधेयक पर वाद-विवाद स्थगित किया जाये।

१७१- विधेयक की वापसी-

विधेयक के भार-साधक सदस्य विधेयक के किसी प्रक्रम पर विधेयक को इस आधार पर वापस लेने की अनुमति का प्रस्ताव वापस कर सकेंगे कि:-

(क) विधेयक में अन्तर्विष्ट विधायिनी प्रस्थापना समाप्त की जानी है, या

(ख) बाद में उस विधेयक के स्थान में एक नया विधेयक लाया जाना है जिससे उसमें अन्तर्विष्ट उपबन्धों में सारतः रूपान्तर हो जायगा; या

(ग) बाद में उस विधेयक के स्थान पर एक नया विधेयक लाया जाना है जिसमें अन्य उपबन्धों के अतिरिक्त उसके सभी या कुछ उपबन्ध सम्मिलित होंगे,

                और यदि ऐसी अनुमति दी जाय तो विधेयक के संबंध में अग्रेतर  प्रस्ताव नहीं किया जायेगा और वह स्वतः वापस किया हुआ समझा जायगा:

            परन्तु जब कोई विधेयक परिषद् में आरम्भ हुआ हो और सदन के समक्ष लम्बित हो तो विधेयक भार-साधक सदस्य सदन में यह प्रस्ताव करेंगे कि यदि परिषद् विधेयक को सदन द्वारा वापस किये जाने की अनुमति से सहमत हो तो विधेयक को वापस लेने की अनुमति दी जाय और यदि सदन इस प्रस्ताव को अंगीकार कर ले और परिषद् इस प्रस्ताव से सहमत हो जाय तो उसकी सूचना प्रमुख सचिव द्वारा सदन को दी जायगी और यह समझा जायेगा कि विधेयक वापस किया गया।

१७२- विधेयक की वापसी का प्रस्ताव या उसका विरोध करने वाले सदस्य द्वारा व्याख्यात्मक वक्तव्य-

यदि किसी विधेयक को वापस लेने की अनुज्ञा के प्रस्ताव का विरोध किया जाय तो अध्यक्ष, यदि वे ठीक समझें, प्रस्ताव प्रस्तुत करने वाले सदस्य को तथा प्रस्ताव का विरोध करने वाले सदस्य को संक्षिप्त व्याख्यात्मक वक्तव्य देने की अनुज्ञा दे सकेंगे और उसके बाद और अधिक वाद-विवाद के बिना, प्रश्न रख सकेंगे।

१७3- विधेयकों की पंजी से किसी विधेयक को हटाना-

(१) जब सदन विधेयक भार-साधक सदस्य द्वारा किये गये निम्नलिखित प्रस्तावों में से किसी प्रस्ताव को अस्वीकार कर दे तो उस विधेयक के संबंध में कोई अन्य प्रस्ताव नहीं किया जायेगा, और ऐसा विधेयक उस सत्र के लिए सदन में लम्बित विधेयकों की पंजी में से निकाल दिया जायेगा-

१- कि विधेयक को पुरःस्थापित करने की अनुज्ञा दी जाय,

२- कि विधेयक एक प्रवर समिति या संयुक्त प्रवर समिति को सौंपा जाय या उस पर राय जानने के प्रयोजन से उसे परिचालित किया जाय,

३- कि विधेयक पर विचार किया जाय,

४- कि प्रवर समिति या संयुक्त प्रवर समिति द्वारा प्रतिवेदित रूप में विधेयक पर विचार किया जाय, और

५- कि विधेयक (या यथास्थिति, संशोधित रूप में विधेयक) पारित किया जाय।

(२) सदन के सामने लम्बित विधेयक सदन द्वारा सारत: समान विधेयक पारित हो चुकने की या नियम १७१ के अधीन विधेयक के वापस हो जाने की अवस्था में सदन में लम्बित विधेयकों को पंजी में से निकाल दिया जायेगा।

व्याख्या- सदन के सामने लम्बित विधेयक में ये सम्मिलित होंगे-

(१) सदन में पुरःस्थापित विधेयक जो इस नियम या नियम- १७४ में उल्लिखित विधेयकों के वर्गों के अन्दर नहीं आता,

(२) यथास्थिति, परिषद् को पहुँचाया गया तथा परिषद् द्वारा संशोधन, या सिफारिश सहित, लौटाया गया और नियम-१५४ के अन्तर्गत पटल पर रखा गया विधेयक,

(३) परिषद् में आरम्भ और सदन को पहुंचाया गया और नियम- १६१ या १६८ (१) (क) के अन्तर्गत पटल पर रखा गया विधेयक, तथा

(४) यथास्थिति, संविधान के अनुच्छेद २०० या २०१ के अन्तर्गत राज्यपाल के या राष्ट्रपति के संदेश के साथ लौटाया गया विधेयक।

१७४- विधेयकों की पंजी से असरकारी सदस्य का विधेयक हटाने के लिये विशेष उपबन्ध-

सदन के सामने लम्बित किसी असरकारी सदस्य का विधेयक सदन में लम्बित विधेयकों की पंजी में से हटा दिया जायेगा, यदि-

(क) विधेयक भार-साधक सदस्य सदन के सदस्य न रहें;

(ख) विधेयक भार-साधक सदस्य मंत्री नियुक्त किये जायं।

१७५- अपास्त विधेयक-

विधेयक, जिसके संबंध में दो वर्ष तक सभा में कोई प्रस्ताव प्रस्तुत न हुआ हो, अपास्त समझा जायेगा और अध्यक्ष के आदेश से विधेयकों की पंजी में से हटा दिया जायगा।

(ड) सदन के सामने रखे गये संविहित विनियम, नियम आदि

१७६- विनियम, नियम आदि का सदन के पटल पर रखा जाना-

(१) जब संविधान, संसद या विधान मण्डल द्वारा किसी प्राधिकारी को प्रत्यायोजित विधायी कृत्यों के अनुसरण में बनाये गये विनियम, नियम, उप नियम, उप विधि आदि सदन के सामने रखे जायं तो तत्संगत विधि में उल्लिखित कालावधि जिसके लिये उसके रखे जाने की अपेक्षा हो सभा के सत्रावसान होने के पहले पूरी की जायेगी जब तक कि तत्संगत विधि में अन्यथा उपबन्धित न हो।

(२) जब उल्लिखित कालावधि इस तरह पूरी न हो तो विनियम, नियम, उप नियम, उप विधि आदि अनुवर्ती सत्र या सत्रों में पुनः रखे जायेंगे जब तक कि कथित कालावधि एक सत्र में पूरी न हो जाय।

१७७- संशोधन पर चर्चा के लिये समय का नियतन-

(१) पटल पर रखे गये विनियम, नियम, उप नियम, उप विधि आदि के संबंध में सदस्यों द्वारा संशोधन उस अवधि के भीतर प्रस्तुत किये जा सकेंगे जो अधिनियम में उनके पटल पर रखे जाने के लिये विहित हों तथा इन संशोधनों पर विचार व विनिश्चय के लिये वे नियम यथोचित परिवर्तनों सहित लागू होंगे जो विधेयक के खण्डों के संशोधनों के लिये विहित हैं।

(२) अध्यक्ष, सदन नेता के परामर्श से इन संशोधनों पर विचार तथा विनिश्चय करने के लिये तिथि निश्चित करेंगे।

१७८- संशोधन का परिषद् को पहुंचाना-

संशोधन सभा द्वारा पारित किये जाने के बाद परिषद् को उसकी सहमति के लिये पहुंचाया जायगा और परिषद् से संशोधन की स्वीकृति का सन्देश प्राप्त होने पर प्रमुख सचिव द्वारा शासन को भेजा जायगा किन्तु यदि तत्संगत अधिनियम के अधीन परिषद् की सहमति अपेक्षित न हो तो प्रमुख सचिव सभा द्वारा पारित संशोधनों की सूचना तुरन्त शासन को भेज देंगे।

१७९- परिषद् द्वारा लौटाया गया संशोधन-

यदि परिषद् सदन द्वारा पारित संशोधन से असहमत हो या उसे उसके अग्रेतर संशोधन के अधीन स्वीकार करे या उसके स्थान में अन्य संशोधन प्रस्थापित करे, तो सदन या तो संशोधन को अपास्त कर सकेगा या प्रस्थापित संशोधन में परिषद् से सहमत हो सकेगा या सदन द्वारा पारित मूल संशोधन पर आगृह कर सकेगा। प्रत्येक दशा में परिषद् को सन्देश भेजा जायेगा। यदि सदन परिषद् द्वारा अग्रेतर संशोधित संशोधन या परिषद् द्वारा प्रस्थापित अन्य संशोधन से सहमत हो तो संशोधन जिससे सदन इस प्रकार सहमत हो प्रमुख सचिव द्वारा शासन को भेजा जायेगा।

१८०- सदनों के बीच असहमति-

यदि परिषद् सदन द्वारा पारित मूल संशोधन से सहमत हो जाये तो वह प्रमुख सचिव द्वारा शासन को भेजा जायेगा, किन्तु यदि परिषद् असहमत हो तो या ऐसे संशोधन पर आगृह करे जिससे सदन सहमत न हुआ हो तो यह समझा जायेगा कि सदन अन्तिम रूप से सहमत हो गये हैं और उस पर सब अग्रेतर कार्यवाही अपास्त कर दी जायेगी।

१८१- सदन को सूचना-

प्रत्येक दशा में संशोधन के संबंध में परिषद् की सहमति या असहमति की सूचना प्रमुख सचिव द्वारा सदन को दी जायेगी।

(ढ) संविधान में संशोधनों के अनुसमर्थन की प्रक्रिया

१८२ संविधान में संशोधन का अनुसमर्थन -

(१) संविधान में संशोधन के अनुसमर्थन के संचार या संदेश के प्राप्ति होने पर उसको विधेयक एवं तदविषयक वाद-विवाद की प्रतिलिपि सहित प्रमुख सचिव द्वारा सदन के पटल पर रखा जायेगा।

(२) अध्यक्ष सदन-नेता के परामर्श से संविधान में संशोधन के अनुसमर्थन के संकल्प पर चर्चा के लिये दिन नियत करेंगे।

(३) संकल्पों से संबंधित नियम एवं आदेश उक्त चर्चा पर यथोचित परिवर्तनों सहित प्रयुक्त होंगे।

(४) सभा द्वारा पारित हो जाने पर संकल्प की प्रतिलिपि प्रमुख सचिव द्वारा शासन तथा संसद को भेजी जायेगी। संकल्प के पारित न होने की दशा में तदविषयक सूचना भेज दी जायेगी।

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